वृंदावन की संत परम्परा भारतीय भक्ति संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। इस परम्परा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने अपने तप, त्याग और श्री राधा-कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम से ब्रजभूमि की आध्यात्मिक गरिमा को समृद्ध किया। इन्हीं महान संतों में श्री राधाशरण देव जी का नाम अत्यंत श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे वृंदावन के प्रसिद्ध टटिया स्थान की परम्परा के प्रमुख संत, आचार्य और महंत थे। उनका सम्पूर्ण जीवन गुरु-सेवा, भक्ति, वैराग्य और संत परम्परा के संरक्षण के लिए समर्पित रहा।
श्री राधाशरण देव जी बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। सांसारिक आकर्षणों की अपेक्षा उनका मन भगवान की भक्ति, संत-संग और साधना में अधिक लगता था। इसी आध्यात्मिक जिज्ञासा ने उन्हें वृंदावन की पावन भूमि तक पहुँचाया, जहाँ उन्होंने रसिक संतों के सान्निध्य में अपने जीवन को नई दिशा दी।
गुरु एवं दीक्षा
श्री राधाशरण देव जी, श्री ललितमोहिनी देव जी के कृपापात्र शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरु से रसिक भक्ति, वैराग्य, सेवा, नाम-स्मरण तथा वृंदावन की संत परम्परा की शिक्षा प्राप्त की।
गुरु की कृपा से वे शीघ्र ही टटिया स्थान की परम्परा के प्रतिष्ठित संतों में गिने जाने लगे। उनके जीवन में गुरु-भक्ति सर्वोच्च स्थान रखती थी और वे अपने प्रत्येक कार्य को गुरु की आज्ञा के अनुरूप ही करते थे।
श्री सहचरीशरण देव जी को दीक्षा
परम्परागत विवरणों के अनुसार वर्ष 1784 में श्री राधाशरण देव जी ने सखाराम को दीक्षा प्रदान की। दीक्षा के पश्चात उन्होंने उनका नया आध्यात्मिक नाम “श्री सहचरीशरण देव जी“ रखा।
यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक नए आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ था। श्री सहचरीशरण देव जी आगे चलकर टटिया स्थान की परम्परा के प्रमुख आचार्यों में सम्मिलित हुए।
टटिया स्थान के महंत के रूप में योगदान
श्री राधाशरण देव जी ने 1811 से 1821 तक टटिया स्थान के महंत के रूप में सेवा की। उनके महंत काल में आश्रम में भजन, साधना, संत-संग, वैष्णव मर्यादा और रसिक परम्परा का विशेष विकास हुआ।
उन्होंने साधकों को केवल शास्त्रीय ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि अपने आचरण से भी सिखाया कि संत जीवन का वास्तविक आधार विनम्रता, सेवा और प्रेम है।
उत्तराधिकारी की नियुक्ति
अपने जीवनकाल में ही उन्होंने योग्य शिष्य तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया। उनके प्रमुख शिष्य श्री सहचरीशरण देव जी आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत योग्य सिद्ध हुए।
वर्ष 1821 में श्री राधाशरण देव जी के तिरोभाव के पश्चात श्री सहचरीशरण देव जी टटिया स्थान के महंत बने और उन्होंने अपने गुरु की परम्परा को आगे बढ़ाया।
भक्ति एवं साधना का स्वरूप
श्री राधाशरण देव जी की साधना के प्रमुख आधार थे—
- श्री राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति
- गुरु-सेवा
- हरिनाम-जप
- वैराग्य
- संत-संग
- ब्रजभाव
- मानसी सेवा
- विनम्र जीवन
वे मानते थे कि भगवान की कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग निष्काम प्रेम और निरंतर सेवा है।