ब्रजभूमि सदैव से महान संतों, भक्तों और रसिक आचार्यों की पावन भूमि रही है। इस दिव्य भूमि पर अनेक ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने अपने जीवन को श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति के लिए समर्पित कर दिया। इन्हीं महान रसिक संतों में श्री सरस देव जी महाराज का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।
श्री सरस देव जी श्री स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रवर्तित हरिदासी सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यों में से एक थे। वे अपनी सरलता, विनम्रता, संत सेवा और श्री श्यामा-कुंज बिहारी के प्रति अनन्य प्रेम के लिए प्रसिद्ध थे। उनका जीवन नित्य विहार रस की साधना और श्री युगल सरकार की प्रेममयी उपासना का अद्भुत उदाहरण है।
श्री सरस देव जी का जन्म एवं परिवार परिचय
श्री सरस देव जी का जन्म आश्विन पूर्णिमा संवत् 1554 में हुआ माना जाता है। वे बंगाल राज्य के मंत्री श्री कमलापति जी के छोटे पुत्र थे। उनके बड़े भाई का नाम श्री नागरीदास जी था।
श्री सरस देव जी का परिवार अत्यंत प्रतिष्ठित और धार्मिक संस्कारों वाला था। राजसी वातावरण में जन्म लेने के बावजूद उनके हृदय में सांसारिक वैभव के प्रति आकर्षण नहीं था। उनका मन प्रारम्भ से ही संतों की सेवा, भगवान के स्मरण और आध्यात्मिक चिंतन में लगता था।
बड़े भाई श्री नागरीदास जी की तरह ही श्री सरस देव जी के हृदय में भी श्री राधा-कृष्ण के प्रति गहरी प्रेम भावना थी।
बाल्यकाल से ही भक्ति संस्कार
श्री सरस देव जी बचपन से ही अत्यंत शांत, सरल और भक्तिमय स्वभाव के थे। सांसारिक सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी उनका मन सदैव भगवान की ओर आकर्षित रहता था।
उनके हृदय में जीव मात्र के प्रति करुणा और प्रेम का भाव था। वे सभी प्राणियों को अपना मित्र मानते थे और किसी के प्रति भेदभाव नहीं रखते थे।
उनका व्यक्तित्व—
- विनम्रता से परिपूर्ण,
- क्षमाशील,
- करुणामय,
- संत स्वभाव वाला
था।
इसी कारण भक्तजन उन्हें प्रेम और श्रद्धा से स्मरण करते थे।
गुरु श्री बिहारीदास जी से दीक्षा
श्री सरस देव जी ने अपने बड़े भाई श्री नागरीदास जी के साथ श्री बिहारीदास जी महाराज की शरण ग्रहण की और उनसे दीक्षा प्राप्त की।
गुरु कृपा प्राप्त होने के बाद उनका जीवन पूर्ण रूप से बदल गया। उन्होंने अपने जीवन को श्री श्यामा-कुंज बिहारी की सेवा और नित्य विहार रस की साधना में समर्पित कर दिया।
गुरु की आज्ञा और कृपा उनके जीवन का आधार बन गई। वे सदैव गुरु सेवा को सर्वोच्च धर्म मानते थे।
वृन्दावन आगमन एवं साधना जीवन
गुरु दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात श्री सरस देव जी वृन्दावन आए और यहीं रहकर साधना करने लगे।
उन्होंने लगभग 42 वर्षों तक वृन्दावन में निवास किया और श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी उपासना में अपना जीवन व्यतीत किया।
वृन्दावन उनके लिए केवल एक स्थान नहीं था, बल्कि श्री युगल सरकार की नित्य लीला भूमि थी।
उनकी साधना के प्रमुख आधार थे—
- श्री श्यामा-कुंज बिहारी का स्मरण
- संत सेवा
- सत्संग
- नाम जप
- नित्य विहार रस का चिंतन
श्री हरिदासी सम्प्रदाय में योगदान
श्री सरस देव जी श्री हरिदासी सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण आचार्य बने। वे इस सम्प्रदाय के चौथे आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
उन्होंने अपने गुरु से प्राप्त प्रेम-भक्ति की परम्परा को आगे बढ़ाया और अनेक भक्तों को श्री राधा-कृष्ण की मधुर उपासना का मार्ग दिखाया।
उनके जीवन में आचार्य पद का गौरव होने के बाद भी अत्यंत विनम्रता बनी रही।
वे स्वयं को सदैव भगवान और संतों का सेवक मानते थे।
श्री सरस देव जी की वाणी एवं साहित्य
श्री सरस देव जी ने भक्ति और रस से परिपूर्ण अनेक पदों की रचना की।
उनकी वाणी में—
- ब्रज भाषा,
- हिन्दी,
- अन्य क्षेत्रीय भाषाओं
के साथ-साथ कुछ फारसी शब्दों का भी प्रयोग मिलता है, जिससे उनकी भाषा और विद्वत्ता की व्यापकता का पता चलता है।
उनकी वाणी में श्री राधा-कृष्ण के नित्य विहार, प्रेम और भक्ति रस का सुंदर वर्णन मिलता है।
उनके पद आज भी भक्तों को आध्यात्मिक आनंद प्रदान करते हैं।
श्री सरस देव जी के उत्तराधिकारी की भविष्यवाणी
श्री सरस देव जी ने अपने जीवन में लंबे समय तक किसी शिष्य को दीक्षा नहीं दी थी।
जब भक्तों ने उनसे पूछा कि उनके बाद सम्प्रदाय का आचार्य कौन बनेगा, तब उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए बताया कि—
बुंदेलखंड के गुढ़ा ग्राम में श्री विष्णुदास जी के घर एक दिव्य बालक जन्म लेगा, जिसका नाम नरहरिदेव होगा और वही आगे चलकर उनका शिष्य तथा सम्प्रदाय का आचार्य बनेगा।
बाद में यह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई और श्री नरहरिदेव जी उनके उत्तराधिकारी बने।
श्री सरस देव जी का निकुंज गमन
श्री सरस देव जी ने जीवन भर वृन्दावन में रहकर श्री राधा-कृष्ण की सेवा और भक्ति की।
श्रावण पूर्णिमा संवत् 1683 (लगभग 1626 ई.) को उन्होंने अपनी लौकिक लीला समाप्त की और नित्य निकुंज धाम में प्रवेश किया। उस समय उनकी आयु लगभग 72 वर्ष थी।
उन्होंने लगभग 24 वर्षों तक हरिदासी सम्प्रदाय के आचार्य पद को सुशोभित किया।