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Mathura Dham
84 Kos Braj

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श्रीकृष्ण ने पूरे ब्रज को अपनी शरण में ले लिया

ब्रजभूमि की लीलाओं को केवल पढ़ा नहीं जाता, उन्हें भाव के साथ अनुभव किया जाता है। ब्रज की गलियों में, यमुना के तट पर, वृन्दावन के कुंजों में और गिरिराज की परिक्रमा में आज भी भक्तों को उन दिव्य लीलाओं की स्मृति मिलती है, जिनमें श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय ब्रजवासियों के साथ प्रेम का ऐसा संबंध स्थापित किया, जो संसार की किसी सामान्य कथा से कहीं अधिक गहरा है।

इन्हीं लीलाओं में श्रीगोवर्धन लीला का स्थान अत्यंत विशेष है।

गोवर्धन लीला को सामान्य रूप से हम इस रूप में जानते हैं कि इन्द्र के प्रचण्ड क्रोध से ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को उसके नीचे आश्रय दिया। लेकिन जब हम श्रीमद्भागवत महापुराण, हरिवंश, विष्णु पुराण और गर्ग संहिता जैसे ग्रंथों में इस प्रसंग को देखते हैं, तो समझ में आता है कि यह लीला केवल पर्वत उठाने की अद्भुत घटना नहीं है।

इसके पीछे एक पूरी आध्यात्मिक यात्रा है—इन्द्र-यज्ञ की परम्परा, श्रीकृष्ण के प्रश्न, गोवर्धन-पूजा, ब्रजवासियों का उत्सव, इन्द्र का अभिमान, भयंकर वर्षा, श्रीकृष्ण की शरणागति, गिरिराज का धारण और अंत में इन्द्र के अहंकार का शांत होना।

यही कारण है कि गोवर्धन लीला आज भी ब्रज के हृदय में जीवित है।

ब्रज और गोवर्धन का संबंध

ब्रज का जीवन सदियों से गौ, गोपालन, वन, पर्वत, जल और कृषि से जुड़ा रहा है। ब्रजवासी अपने जीवन का आधार गौधन को मानते थे और गौओं के पालन के लिए हरी घास, वनस्पति और जल की आवश्यकता थी।

गोवर्धन पर्वत इस प्राकृतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

उसके वन, कुंज, जलस्रोत और आसपास की भूमि ब्रज के जीवन से जुड़े हुए थे। इसलिए श्रीकृष्ण ने जब गोवर्धन-पूजा की बात कही, तो उसके पीछे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का विचार नहीं था। उसमें ब्रज की जीवन-पद्धति, गौधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी दिखाई देता है।

श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण नन्द बाबा से इन्द्र-यज्ञ के विषय में प्रश्न करते हैं। वे जानना चाहते हैं कि यह यज्ञ क्यों किया जा रहा है और इसका वास्तविक प्रयोजन क्या है।

बालक कृष्ण के ये प्रश्न साधारण प्रश्न नहीं थे।

वे धीरे-धीरे ब्रजवासियों को यह समझाने की दिशा में ले जा रहे थे कि मनुष्य को अपने जीवन के वास्तविक आधार और अपने कर्म के स्वरूप को समझना चाहिए।

इन्द्र-यज्ञ और श्रीकृष्ण का प्रश्न

उस समय ब्रजवासी वर्षा के देवता इन्द्र की पूजा किया करते थे। वर्षा उनके जीवन के लिए आवश्यक थी। वर्षा से घास और अन्न उत्पन्न होते थे, गौओं के लिए चारा मिलता था और उनका पूरा जीवन सुचारु रूप से चलता था।

नन्द महाराज और ब्रज के अन्य गोप इन्द्र-यज्ञ की तैयारी कर रहे थे।

तभी श्रीकृष्ण ने पूछा—

“पिताजी, यह तैयारी किसलिए हो रही है?”

नन्द महाराज ने उन्हें इन्द्र-यज्ञ के बारे में बताया।

श्रीकृष्ण ने फिर पूछा कि इन्द्र की पूजा करने से क्या प्राप्त होता है और मनुष्य को अपने कर्म तथा जीवन के वास्तविक आधार के विषय में किस प्रकार विचार करना चाहिए।श्रीमद्भागवत के इस प्रसंग में श्रीकृष्ण कर्म, प्रकृति और देवताओं की भूमिका पर ब्रजवासियों के सामने एक गंभीर विचार रखते हैं।श्रीकृष्ण का उद्देश्य केवल किसी परम्परा को रोकना नहीं था। वे ब्रजवासियों को उनकी अपनी जीवन-पद्धति की ओर देखने के लिए प्रेरित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि ब्रजवासियों का जीवन गौओं, गोपालन, वन और गोवर्धन से जुड़ा है। इसलिए उन्हें गौ, ब्राह्मण और गोवर्धन का सम्मान करते हुए उत्सव मनाना चाहिए।

गोवर्धन पूजा का निर्णय

श्रीकृष्ण की बात सुनकर ब्रजवासियों ने इन्द्र-यज्ञ की सामग्री से ही गोवर्धन-पूजा करने का निर्णय लिया।

दूध, दही, घी और अनेक प्रकार के पकवान तैयार किए गए। ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। गौओं को सजाया गया। ब्रज में उत्सव का वातावरण बन गया। श्रीमद्भागवत में गोवर्धन-पूजा के इस प्रसंग का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है। ब्रज का प्रत्येक परिवार इस आनंद में सम्मिलित हुआ। यह केवल पूजा नहीं थी। यह ब्रज की सामूहिक श्रद्धा थी। यह अपने जीवन के आधार के प्रति कृतज्ञता थी। यह गौधन के प्रति प्रेम था। और सबसे बढ़कर, यह श्रीकृष्ण की आज्ञा में विश्वास था।

गोवर्धन का दिव्य दर्शन

गोवर्धन महोत्सव के समय श्रीकृष्ण ने गोवर्धन के दिव्य स्वरूप को प्रकट किया।

विष्णु पुराण में इस प्रसंग का एक विशेष वर्णन मिलता है। वहाँ श्रीकृष्ण के गोवर्धन-स्वरूप से संबंधित प्रसंग आता है, जिसमें गोवर्धन को अर्पित किया गया भोजन स्वीकार किया जाता है।

यह प्रसंग भक्तों के लिए बहुत सुंदर भाव रखता है।

भक्त जिस भाव से भगवान को अर्पण करता है, भगवान उसी प्रेम को स्वीकार करते हैं। भोजन की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसका भाव है। इसलिए गोवर्धन-पूजा में अर्पित किया गया प्रत्येक पदार्थ केवल भोजन नहीं था—वह ब्रजवासियों के प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक था।

ब्रज में गोवर्धन महोत्सव

गोवर्धन पूजा के बाद ब्रज में एक विशाल उत्सव हुआ।

गौओं को सजाया गया। ब्रजवासियों ने सुंदर वस्त्र धारण किए। घर-घर से दूध, दही, घी और पकवान आए। ब्राह्मणों का सम्मान किया गया। गौओं की सेवा की गई। गोवर्धन की पूजा की गई। और फिर ब्रजवासियों ने गिरिराज की परिक्रमा की। इससे पता चलता है कि गोवर्धन महोत्सव केवल किसी एक परिवार का उत्सव नहीं था। पूरा ब्रज इसमें शामिल था।

इन्द्र को हुआ अपना अपमान

लेकिन स्वर्गलोक में इन्द्र को जब यह समाचार मिला कि ब्रजवासियों ने उसका यज्ञ रोक दिया है और गोवर्धन की पूजा की है, तो वह क्रोधित हो उठा। इन्द्र ने इसे अपने सम्मान का अपमान समझा। यहीं से गोवर्धन लीला का दूसरा पक्ष शुरू होता है।

एक ओर था ब्रज का प्रेम और उत्सव। दूसरी ओर इन्द्र का अभिमान। इन्द्र के पास देवताओं का पद था। उसके पास अपार शक्ति थी। वर्षा और मेघ उसके अधीन माने जाते थे।

लेकिन उस समय उसके भीतर अपनी शक्ति का गर्व इतना बढ़ गया कि वह यह भूल गया कि स्वयं उसकी शक्ति भी परम भगवान की व्यवस्था के अधीन है।

संवर्तक मेघों को आदेश

क्रोध में आकर इन्द्र ने सामान्य वर्षा नहीं करवाई।

उसने संवर्तक मेघों को ब्रज की ओर भेज दिया। ये वही प्रचण्ड मेघ माने जाते हैं जिनका संबंध प्रलयकारी वर्षा से है। आकाश में काले बादल छा गए। तेज हवाएँ चलने लगीं। जली चमकने लगी। मेघों की गर्जना से पूरा ब्रज कांप उठा। फिर ऐसी वर्षा शुरू हुई जिसकी कल्पना सामान्य मनुष्य नहीं कर सकता। श्रीमद्भागवत में वर्णन आता है कि वर्षा इतनी भयंकर थी कि ब्रज की भूमि जल से भर गई। गौएँ और बछड़े ठंड से कांपने लगे। गोप और गोपियाँ भयभीत हो गए। गौएँ अपने बछड़ों को बचाने के लिए उन्हें अपने शरीर से ढँकने लगीं। ब्रज संकट में था।

ब्रजवासियों की पुकार

जब कोई उपाय नहीं बचा, तब ब्रजवासियों की दृष्टि श्रीकृष्ण की ओर गई। वे अपने प्रिय कृष्ण के पास पहुँचे। उनके पास कोई हथियार नहीं था। कोई बड़ी सेना नहीं थी। कोई ऐसा साधन नहीं था जिससे वे इन्द्र की उस प्रचण्ड वर्षा को रोक सकें। लेकिन उनके पास एक चीज थी—

श्रीकृष्ण पर विश्वास।

उन्होंने कृष्ण को पुकारा। उनका विश्वास था कि नन्दलाल ही उनकी रक्षा कर सकते हैं। यही गोवर्धन लीला का सबसे भावपूर्ण क्षण है। भक्त जब अपने सभी बाहरी सहारे खो देता है और केवल भगवान की शरण में जाता है, तब भगवान स्वयं उसके सहारे बन जाते हैं।

श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की ओर देखा

श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके ब्रजवासी भयभीत हैं। गौएँ संकट में हैं। बच्चे रो रहे हैं। गोप और गोपियाँ परेशान हैं। तब श्रीकृष्ण ने निश्चय किया कि वे अपने ब्रज की रक्षा करेंगे। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि वे ब्रजवासियों की रक्षा करेंगे और इन्द्र के अभिमान को भी दूर करेंगे। भगवान के सामने दो उद्देश्य थे—

ब्रजवासियों की रक्षा और इन्द्र के अहंकार का निवारण।

श्रीकृष्ण ने उठाया गोवर्धन

तभी श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने अपने हाथ से गिरिराज को उठाया। जिस पर्वत को मनुष्य हिला भी नहीं सकता, श्रीकृष्ण ने उसे सहजता से धारण कर लिया। श्रीमद्भागवत में इस अद्भुत दृश्य को अत्यंत सुंदर उपमा के साथ बताया गया है। श्रीकृष्ण के लिए गोवर्धन धारण करना उतना ही सहज था जैसे कोई बालक कोई हल्की वस्तु उठा ले। हरिवंश में श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन को बाएँ हाथ से धारण करने का उल्लेख मिलता है। और ब्रज की भक्ति परम्परा में यही दृश्य आज भी अत्यंत प्रेम से स्मरण किया जाता है—

एक हाथ में गिरिराज, मुख पर मुस्कान, चारों ओर ब्रजवासी, और सबके हृदय में केवल कृष्ण।

गिरिराज बन गए ब्रज का छत्र

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को एक विशाल छत्र के समान धारण कर लिया।

उन्होंने ब्रजवासियों से कहा कि वे अपनी गौओं, परिवारों और आवश्यक वस्तुओं के साथ पर्वत के नीचे आ जाएँ।

अब बाहर चाहे जितनी वर्षा हो— ब्रजवासियों को भय नहीं था। क्योंकि उनके ऊपर गिरिराज था। और गिरिराज को धारण करने वाले स्वयं श्रीकृष्ण थे। बाहर इन्द्र का प्रकोप था अंदर कृष्ण की करुणा। बाहर तूफान था। अंदर प्रेम। बाहर भय था। अंदर विश्वास। यही गोवर्धन लीला की सबसे सुंदर तस्वीर है।

सात दिनों तक गोवर्धन धारण

श्रीमद्भागवत और हरिवंश दोनों में सात दिनों का विशेष उल्लेख मिलता है श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन को धारण किए रखा। इन सात दिनों में ब्रजवासी उसी पर्वत के नीचे रहे। गौएँ वहीं थीं। गोप वहीं थे। गोपियाँ वहीं थीं। बालक वहीं थे। और सबसे महत्वपूर्ण—सबके बीच श्रीकृष्ण थे।

श्रीमद्भागवत में यह भाव अत्यंत सुंदर है कि ब्रजवासी श्रीकृष्ण के दर्शन में इतने तल्लीन हो गए कि उन्हें अपनी सामान्य आवश्यकताओं का भी विशेष ध्यान नहीं रहा।

उनकी दृष्टि केवल अपने प्रिय कृष्ण पर थी।

इन्द्र की सारी शक्ति असफल

इन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। संवर्तक मेघ वर्षा करते रहे। हवाएँ चलती रहीं। बिजली चमकती रही। लेकिन ब्रजवासियों का कुछ नहीं बिगड़ा।

गोवर्धन उनके लिए अभेद्य आश्रय बन चुका था। इन्द्र को पहली बार यह अनुभव हुआ कि उसकी शक्ति किसी ऐसी सत्ता के सामने है, जिसके सामने उसका देवत्व भी सीमित है। उसका अभिमान धीरे-धीरे टूटने लगा।

हरिवंश में वज्र का प्रसंग हरिवंश के वर्णन में इन्द्र द्वारा वज्र का प्रयोग करने का प्रसंग भी आता है।

इन्द्र ने अपनी शक्ति के अंतिम साधनों में से एक—वज्र—का प्रयोग किया। लेकिन श्रीकृष्ण के सामने वह भी निष्फल हो गया।

यह दृश्य केवल श्रीकृष्ण की शक्ति का प्रदर्शन नहीं है। यह उस सत्य को सामने लाता है कि भगवान की इच्छा के बिना कोई शक्ति स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकती।

इन्द्र को अपनी भूल समझ में आई

जब इन्द्र ने देखा कि सात दिनों तक भी उसकी प्रचण्ड वर्षा ब्रजवासियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकी, तब उसका अहंकार टूट गया। उसे समझ आया कि जिस कृष्ण को उसने एक सामान्य गोपबालक समझ लिया था, वह साधारण बालक नहीं हैं। इन्द्र ने मेघों को वापस बुला लिया। आकाश धीरे-धीरे साफ होने लगा। वर्षा रुक गई। हवाएँ शांत हो गईं। सूर्य दिखाई देने लगा। ब्रजभूमि पर फिर से शांति लौट आई।

श्रीकृष्ण ने गिरिराज को वापस रख दिया

जब वर्षा पूरी तरह रुक गई और ब्रजवासी सुरक्षित हो गए, तब श्रीकृष्ण ने सबको बाहर आने के लिए कहा।

सबसे पहले गौधन बाहर आया। फिर गोप, गोपियाँ, बच्चे और अन्य ब्रजवासी बाहर आए। जब सब सुरक्षित हो गए, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसी स्थान पर वापस रख दिया। जिस सहजता से उन्होंने पर्वत उठाया था, उसी सहजता से उसे पुनः स्थापित भी कर दिया। ब्रजवासियों ने आश्चर्य और प्रेम से अपने कृष्ण को देखा।

ब्रजवासियों का कृष्ण के प्रति प्रेम

गोवर्धन रखने के बाद ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण को घेर लिया।

माताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया। गोपों ने उन्हें गले लगाया। ब्रजवासियों के मन में अपने कृष्ण के प्रति प्रेम और भी बढ़ गया। किसी के लिए वे नन्द के लाल थे। किसी के लिए सखा। किसी के लिए गोपाल। किसी के लिए जीवन का आधार। और सभी के लिए वे अपने थे। यही ब्रज की भक्ति का सबसे सुंदर पक्ष है। यहाँ भगवान केवल पूजे नहीं जाते—

भगवान को अपना माना जाता है।

गोवर्धन लीला के बाद इन्द्र का पश्चात्ताप

श्रीमद्भागवत के अगले अध्याय में इन्द्र के पश्चात्ताप का वर्णन मिलता है।

इन्द्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। वह समझ गया कि उसने अपने पद और शक्ति के अभिमान में आकर बहुत बड़ा अपराध किया। वह श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचा। उसने भगवान की महिमा स्वीकार की और उनके प्रति अपनी विनम्रता प्रकट की। यहाँ गोवर्धन लीला एक और गहरा संदेश देती है—

गलती करना मनुष्य या देवता के लिए संभव है, लेकिन अपनी गलती को स्वीकार करके विनम्र होना ही वास्तविक परिवर्तन है।

श्रीकृष्ण का अभिषेक

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 27वें अध्याय में इन्द्र और सुरभि द्वारा श्रीकृष्ण के अभिषेक का वर्णन मिलता है। इन्द्र ने श्रीकृष्ण की दिव्यता को स्वीकार किया।

सुरभि भी वहाँ आईं। श्रीकृष्ण का अभिषेक हुआ और उन्हें गोविन्द नाम से विशेष रूप से संबोधित किया गया।

यह प्रसंग गोवर्धन-लीला का अत्यंत सुंदर समापन प्रस्तुत करता है। जिस इन्द्र ने क्रोध में ब्रज पर वर्षा करवाई थी, वही अंत में श्रीकृष्ण की महिमा स्वीकार करते हुए उनके सामने विनत हुआ। श्रीगिरिराज का स्नान, पंचामृत, दुग्ध, पुष्प, जल और अन्य अर्पणों के साथ पूजा का भावपूर्ण वर्णन मिलता है। इसके बाद इन्द्र के क्रोध और संवर्तक मेघों की वर्षा का प्रसंग आता है। और आगे चलकर श्रीकृष्ण के अभिषेक का वर्णन आता है।

गोवर्धन लीला का सबसे बड़ा संदेश

गोवर्धन लीला को केवल चमत्कार की दृष्टि से देखने पर हम इसकी गहराई को पूरी तरह नहीं समझ पाएँगे। इस लीला में श्रीकृष्ण हमें कई बातें सिखाते हैं।

सबसे पहले—अहंकार से बचना चाहिए। इन्द्र के पास शक्ति थी, लेकिन शक्ति के साथ आया अभिमान उसे गलत निर्णय की ओर ले गया।

दूसरा—अपने जीवन के आधार के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।ब्रजवासियों का जीवन गौ, भूमि, वन, जल और गोवर्धन से जुड़ा था।

तीसरा—भक्ति में विश्वास होना चाहिए। ब्रजवासियों ने संकट के समय श्रीकृष्ण को पुकारा और भगवान ने उनकी रक्षा की।

चौथा—सेवा और करुणा भक्ति का महत्वपूर्ण अंग हैं। गोवर्धन-पूजा में गौ-सेवा, ब्राह्मण-सम्मान और अन्नदान का भाव दिखाई देता है। और सबसे बड़ा संदेश—

जब भक्त सच्चे हृदय से भगवान की शरण में आता है, तो भगवान स्वयं उसका आश्रय बन जाते हैं।

आज के जीवन में गोवर्धन लीला का महत्व

आज हम आधुनिक जीवन जी रहे हैं। हमारे सामने समस्याएँ अलग हैं। हमारे पास आधुनिक साधन हैं। लेकिन मनुष्य का भय, चिंता, अहंकार और असुरक्षा आज भी मौजूद है। इसीलिए गोवर्धन लीला आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है। हम इससे सीख सकते हैं कि अपने पद, धन, शक्ति और उपलब्धियों पर अहंकार नहीं करना चाहिए।हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। गौ-सेवा और जरूरतमंदों की सेवा को महत्व देना चाहिए। संकट के समय धैर्य और विश्वास रखना चाहिए। और सबसे बढ़कर, अपने जीवन में प्रेम, करुणा, सेवा और विनम्रता को स्थान देना चाहिए।

गोवर्धन – केवल पर्वत नहीं

ब्रज के भक्त के लिए गोवर्धन केवल पत्थरों और मिट्टी से बना एक पर्वत नहीं है। गोवर्धन के साथ श्रीकृष्ण की स्मृति जुड़ी है। ब्रजवासियों का प्रेम जुड़ा है। गौधन की सेवा जुड़ी है। रसिक संतों की साधना जुड़ी है। परिक्रमा का भाव जुड़ा है। और भगवान के आश्रय की अनुभूति जुड़ी है। इसीलिए जब कोई भक्त प्रेम से कहता है—

“गिरिराज महाराज की जय!” तो वह केवल एक पर्वत की जय नहीं बोलता। वह उस दिव्य लीला की जय बोलता है जिसमें श्रीकृष्ण ने अपने पूरे ब्रज को अपने संरक्षण में लिया था।

प्रेम की छत्रछाया

कल्पना कीजिए— आकाश में काले बादल हैं। बिजली चमक रही है।

चारों ओर जल ही जल है।गौएँ भयभीत हैं। बच्चे अपनी माताओं से लिपटे हैं। गोप और गोपियाँ चिंतित हैं। और तभी ब्रज का एक बालक आगे बढ़ता है। वह गोवर्धन को उठा लेता है। उसके चेहरे पर भय नहीं है। उसके चेहरे पर सहज मुस्कान है। वह अपने ब्रजवासियों से कहता है—

“डरो मत।”

बस यही गोवर्धन लीला का हृदय है।

भगवान की शक्ति से भी अधिक सुंदर है उनका भक्तों के प्रति प्रेम

जहाँ प्रेम है, वहाँ कृष्ण हैं। जहाँ सेवा है, वहाँ भक्ति है। जहाँ विनम्रता है, वहाँ कृपा है। और जहाँ श्रीकृष्ण की शरण है, वहाँ भय का कोई स्थान नहीं।

श्रीराधे। श्रीराधे। श्रीराधे।

प्रमुख शास्त्रीय स्रोत

वृन्दारस का विनम्र उद्देश्य: इन सभी शास्त्रीय परम्पराओं के माध्यम से श्रीगोवर्धन लीला को श्रद्धा, सरलता और संदर्भ सहित प्रस्तुत करना, ताकि नई पीढ़ी भी ब्रज की इस अमूल्य आध्यात्मिक विरासत को समझ सके और उससे जुड़े प्रेम, सेवा, विनम्रता एवं शरणागति के भाव को अपने जीवन में उतार सके।

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