श्री वनचंद्र गोस्वामी जी महाराज राधावल्लभ सम्प्रदाय के इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वे श्री हित हरिवंश महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म चैत्र कृष्ण षष्ठी, संवत् 1528 में देववन में हुआ। प्रारम्भिक समय में वे देववन में श्री नवरंगी लाल जी की सेवा करते थे, किन्तु बाद में श्रीधाम वृन्दावन आकर श्रीराधावल्लभ परम्परा की सेवा और संरक्षण में अपना जीवन समर्पित कर दिया। श्री हित महाप्रभु के निकुञ्ज-प्रवेश के पश्चात् रसिक भक्तों ने उन्हें सम्प्रदाय की गद्दी पर प्रतिष्ठित किया, जहाँ वे “श्री बनमालीदास“ के नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रथम आचार्य
श्री वनचंद्र जी ने केवल परम्परा का उत्तरदायित्व ही नहीं संभाला, बल्कि श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित प्रेम-प्रधान भक्ति को संगठित स्वरूप प्रदान किया। उनके नेतृत्व में राधावल्लभ सम्प्रदाय में श्रीराधा की अनन्य उपासना, रसोपासना और निकुञ्ज-भाव की साधना और अधिक सुदृढ़ हुई।
उनके अनुसार—
- श्रीराधा ही प्रेम की परम अधिष्ठात्री हैं।
- श्रीराधा-नाम सम्पूर्ण साधना का सार है।
- वृन्दावन प्रेम के बिना रसोपासना अधूरी है।
- गुरु-कृपा ही भक्ति का वास्तविक द्वार है।
“हमारे बल श्री राधा नाम” – उनकी साधना का मूल संदेश
श्री वनचंद्र जी की प्रसिद्ध वाणी “हमारे बल श्री राधा नाम“ उनकी सम्पूर्ण साधना का सार प्रस्तुत करती है। वे कहते हैं कि किसी साधक का आधार जप, तप, व्रत या तीर्थ हो सकता है, किन्तु उनका एकमात्र आश्रय श्रीराधा का नाम है। यही उनके जीवन का बल, साधना और परम धन है यह शिक्षा आज भी राधावल्लभ सम्प्रदाय की मूल आध्यात्मिक धारा मानी जाती है।
श्रीराधा–नाम की महिमा
श्री वनचंद्र जी के अनुसार श्रीराधा-नाम केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि प्रेम-रस का दिव्य स्रोत है। वे बताते हैं कि—
- श्रीराधा-नाम से मन पवित्र होता है।
- नाम-जप से हृदय में प्रेम जागृत होता है।
- नाम-स्मरण से भगवान की कृपा सहज प्राप्त होती है।
- श्रीराधा-नाम ही कलियुग का सर्वोत्तम आध्यात्मिक आश्रय है।
वृन्दावन के प्रति अनन्य प्रेम
श्री वनचंद्र जी का सम्पूर्ण जीवन श्रीधाम वृन्दावन की सेवा में समर्पित रहा। उनके अनुसार वृन्दावन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण की नित्य प्रेम-लीलाओं का दिव्य धाम है उनकी दृष्टि में—
- ब्रज की रज अमूल्य है।
- वृन्दावन का प्रत्येक कुंज दिव्य प्रेम का केन्द्र है।
- ब्रजवास आत्मा का सौभाग्य है।
- श्रीराधा की कृपा से ही वृन्दावन का वास्तविक अनुभव होता है।
श्रीराधा–कृष्ण की प्रेममयी उपासना
श्री वनचंद्र जी की वाणी में श्रीराधा-कृष्ण की युगल माधुरी का अत्यन्त कोमल और रसपूर्ण वर्णन मिलता है। वे बताते हैं कि भगवान की प्राप्ति केवल ज्ञान या कर्म से नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम और पूर्ण समर्पण से होती है उनकी साधना के प्रमुख आधार थे—
- श्रीराधा-नाम का जप।
- युगल सरकार का ध्यान।
- निकुञ्ज-भाव की उपासना।
- संत-संग और गुरु-सेवा।
- निष्काम प्रेम।
गुरु–भक्ति और परम्परा का संरक्षण
श्री वनचंद्र जी ने अपने पूज्य पिता श्री हित हरिवंश महाप्रभु की शिक्षाओं को केवल सुरक्षित ही नहीं रखा, बल्कि उन्हें आगे बढ़ाया। उन्होंने प्रेम, सेवा और श्रीराधा-केंद्रित भक्ति को सम्प्रदाय का स्थायी आधार बनाया। उनकी वाणी में गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और आज्ञापालन का संदेश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।