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श्री सहजो बाई
Saints of Braj

श्री सहजो बाई

भारतीय संत परम्परा में अनेक महान संत-कवयित्रियों ने अपनी भक्ति, वैराग्य और आध्यात्मिक अनुभूतियों से समाज को नई दिशा प्रदान की। इन्हीं महान विभूतियों में श्री सहजो बाई का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे संत चरणदास जी की परम शिष्या थीं और उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, ईश्वर-प्रेम, वैराग्य, नाम-स्मरण तथा आत्मज्ञान का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

उनकी रचनाएँ आज भी साधकों को सरल, सहज और प्रेममय भक्ति का मार्ग दिखाती हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति सहज प्रकाश संत साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।

जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन

श्री सहजो बाई का जन्म लगभग 1725 ईस्वी के आसपास माना जाता है। विभिन्न परम्पराओं में उनके जन्मस्थान के विषय में अलग-अलग मत मिलते हैं, किन्तु सामान्यतः उन्हें राजस्थान–दिल्ली क्षेत्र से संबंधित माना जाता है। उनके पिता का नाम हरिप्रसाद बताया जाता है। प्रारम्भ से ही उनका मन सांसारिक विषयों की अपेक्षा धर्म, भक्ति और साधना में अधिक लगता था।

संत चरणदास जी से दीक्षा

श्री सहजो बाई के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें महान संत श्री चरणदास जी महाराज का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

उन्होंने चरणदास जी को केवल गुरु ही नहीं, बल्कि साक्षात् परमात्मा का स्वरूप माना। उनकी अधिकांश वाणी में गुरु महिमा का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है। उनके अनुसार गुरु ही अज्ञान का नाश कर आत्मा को परम सत्य का बोध कराते हैं।

गुरुभक्ति का अद्वितीय आदर्श

श्री सहजो बाई की साधना का केंद्र गुरुभक्ति था।

उनका प्रसिद्ध दोहा—

सब पर्वत स्याही करूँ, घोलूँ समुद्र जाय।
धरती का कागद करूँ, गुरु अस्तुति समाय॥

इस बात को स्पष्ट करता है कि वे गुरु की महिमा को अनन्त मानती थीं। उनके अनुसार संसार की कोई वस्तु गुरु के उपकार का वर्णन नहीं कर सकती।

आध्यात्मिक साधना

श्री सहजो बाई ने आजीवन—

  • नाम-स्मरण,
  • गुरु सेवा,
  • वैराग्य,
  • सत्संग,
  • आत्मचिन्तन,
  • और ईश्वर प्रेम

को अपने जीवन का आधार बनाया।

वे बाहरी आडम्बरों की अपेक्षा आन्तरिक शुद्धता और निष्कपट भक्ति पर अधिक बल देती थीं।

सहज प्रकाश‘ – उनकी अमूल्य कृति

श्री सहजो बाई की सबसे प्रसिद्ध रचना सहज प्रकाश है।

इस ग्रंथ में उन्होंने अत्यंत सरल भाषा में—

  • गुरु महिमा,
  • आत्मज्ञान,
  • प्रेमभक्ति,
  • वैराग्य,
  • नाम-स्मरण,
  • साधु-संग,
  • और जीवन के आध्यात्मिक रहस्यों

का सुंदर वर्णन किया है।

आज भी यह ग्रंथ संत साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिना जाता है।

साहित्यिक योगदान

श्री सहजो बाई ने—

  • दोहे,
  • चौपाइयाँ,
  • कुण्डलियाँ,
  • पद

की रचना की।

उनकी भाषा अत्यंत सरल, सहज और लोकजीवन के निकट है। इसी कारण उनकी वाणी सामान्य जन से लेकर विद्वानों तक सभी के लिए समान रूप से प्रेरणादायक बनी हुई है।

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