ब्रज की रसिक संत परंपरा में श्री रामराय जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। वे गौड़ीय वैष्णव परंपरा के महान संत, श्री नित्यानंद प्रभु के शिष्य तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के कृपापात्र भक्त थे। उनकी साधना का केंद्र श्री राधा-कृष्ण की नित्य निकुंज लीलाओं का चिंतन और वृंदावन धाम की सेवा था। उनकी रचनाएँ आज भी ब्रजभाषा साहित्य और रसिक भक्ति की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।
श्री रामराय जी का प्राकट्य वैशाख शुक्ल एकादशी, सन् 1483 ईस्वी में रावी नदी के तट पर स्थित लाहौर में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम श्री गुरुगोपाल सारस्वत तथा माता का नाम श्रीमती यशोमती था। उनका छोटा भाई श्री चंद्रगोपाल था, जिन्हें संत परंपरा में चित्रा सखी का अवतार माना गया है। श्री रामराय जी, ‘गीत गोविंद’ के अमर रचयिता श्री जयदेव गोस्वामी की वंश परंपरा में ग्यारहवीं पीढ़ी में प्रकट हुए। परिवार में श्री राधामाधव जी की सेवा परंपरागत रूप से होती थी, जिससे बाल्यकाल से ही उनके भीतर भक्ति के संस्कार विकसित हुए।
बाल्यकाल का चमत्कार
जब वे लगभग बारह वर्ष के थे, तब श्री जयदेव गोस्वामी के प्राकट्य उत्सव पर सैकड़ों के स्थान पर लगभग एक हजार ब्राह्मण भोजन के लिए आ पहुँचे। परिवार चिंतित हो गया कि इतने लोगों के लिए प्रसाद कैसे पर्याप्त होगा। श्री रामराय जी ने विश्वासपूर्वक कहा कि श्री राधामाधव का प्रसाद कभी समाप्त नहीं होता। उन्होंने स्वयं प्रसाद वितरण किया और सभी श्रद्धालुओं को तृप्ति से भोजन प्राप्त हुआ। यह घटना उनके अटूट विश्वास और भगवान पर पूर्ण समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।
श्री राधामाधव की आज्ञा से वृंदावन आगमन
एक दिन श्री राधामाधव जी ने उन्हें दिव्य आदेश दिया कि वे पहले वृंदावन जाएँ और वहाँ निवास की व्यवस्था करें। भगवान की आज्ञा पाकर वे बाल्यावस्था में ही घर छोड़कर वृंदावन की यात्रा पर निकल पड़े। ब्रज में प्रवेश करते ही उनके हृदय में दिव्य प्रेम का उदय हुआ। धीर-समीर पर उन्होंने श्री यमुना जी के दर्शन किए और श्री वृंदावन की दिव्य निकुंज लीलाओं का अलौकिक अनुभव प्राप्त किया। उसी समय उन्हें पुनः भगवान की आज्ञा मिली कि वे तीर्थयात्रा करें, गुरु की शरण ग्रहण करें और श्री हरिनाम का प्रचार करें।

श्री नित्यानंद प्रभु से दीक्षा
काशी में विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ के पश्चात उनकी भेंट श्री नित्यानंद प्रभु से हुई। श्री रामराय जी उनके तेज, करुणा और दिव्य व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित हुए तथा उन्हीं से वैष्णव दीक्षा ग्रहण की।
इसके बाद वे श्री नित्यानंद प्रभु के साथ नवद्वीप पहुँचे, जहाँ उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन प्राप्त हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके द्वारा गाए गए गीत गोविंद के पद सुनकर अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें वृंदावन जाकर भक्ति-प्रचार करने का आदेश दिया।
वृंदावन में साधना
श्री रामराय जी ने अपना अधिकांश जीवन श्रीधाम वृंदावन में व्यतीत किया। वे श्री राधा-कृष्ण की नित्य निकुंज लीलाओं के ध्यान, भजन और सेवा में सदैव निमग्न रहते थे। उनके पदों में श्री युगल सरकार के दिव्य श्रृंगार, सखी-भाव और वृंदावन की माधुरी का अत्यंत मनोहर चित्रण मिलता है। उनकी वाणी में भक्त स्वयं को श्री राधा जी की सखी मानकर युगल सरकार की सेवा का भाव अनुभव करता है, जो रसिक भक्ति की विशिष्ट पहचान है।
प्रमुख ग्रंथ एवं साहित्यिक योगदान
श्री रामराय जी ब्रजभाषा के महान कवि और आचार्य थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं—
- आदि वाणी – लगभग 101 पदों का संग्रह, जिसमें श्री राधा-माधव की सेवा और निकुंज-लीलाओं का अत्यंत मधुर वर्णन है।
- गीत गोविंद भाषा – श्री जयदेव कृत संस्कृत गीत गोविंद का ब्रजभाषा पद्य रूपांतरण।
- गौर विनोदिनी टीका – ब्रह्मसूत्र पर लिखी गई टीका के रूप में परंपरा में उल्लेखित।
इन रचनाओं ने ब्रजभाषा और वैष्णव भक्ति साहित्य को समृद्ध किया।
मुख्य शिष्य
श्री रामराय जी के अनेक शिष्य थे, जिनमें प्रमुख हैं—
- श्री भगवानदास
- श्री गरीबदास
- श्री विष्णुदास
- श्री जुगलदास
- श्री राधानाथ
- श्री किशोरदास
- श्री केशवदास
- श्री मनोहरदास
- श्री लक्षदास
- श्री मधुसूदनदास
- श्री हरिदास
- श्री तीर्थराम
इन शिष्यों ने आगे चलकर उनकी भक्ति परंपरा का व्यापक प्रचार किया।