श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी ब्रज-वृन्दावन की रसिक संत परम्परा के भक्त-कवि और साहित्यकार के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उनकी वाणी में श्रीराधा-कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, वृन्दावन के प्रति गहरी निष्ठा और सांसारिक उपलब्धियों से विरक्ति का अत्यन्त सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
उनके पदों से ऐसी रसिक दृष्टि प्रकट होती है जिसमें साधक के लिए संसार की उपलब्धियाँ ही नहीं, बल्कि योग, जप, समाधि, भुक्ति और मुक्ति तक श्री प्रिया-प्रियतम के प्रेम के सामने गौण हो जाते हैं।
उनकी साधना का मूल आकर्षण किसी सिद्धि अथवा मुक्ति की प्राप्ति नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का आस्वादन है।
वृन्दावन धाम के प्रति अनन्य प्रेम
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की आध्यात्मिक चेतना का केन्द्र श्रीधाम वृन्दावन था।
ब्रज की रसिक परम्परा में वृन्दावन केवल एक तीर्थस्थान नहीं माना जाता, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण की नित्य प्रेम-लीलाओं की पावन भूमि के रूप में उसका चिंतन किया जाता है।
इसी भावधारा में श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी का काव्य भी वृन्दावन, श्री युगल सरकार और प्रेम-रस की ओर उन्मुख दिखाई देता है।
वृन्दावन की रज, निकुञ्ज, वन-उपवन, यमुना तट और श्रीराधा-कृष्ण की मधुर लीलाएँ रसिक साधना में केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि प्रेमानुभूति के आधार बन जाते हैं।
श्रीराधा–कृष्ण की नित्य निकुञ्ज–लीलाओं का चिंतन
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की रसिक भावना में श्री प्रिया–प्रियतम की उपासना विशेष रूप से दिखाई देती है।
ब्रज की रसोपासना में श्रीराधा और श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण, उनके रूप-माधुर्य का चिंतन और उनकी सेवा की अभिलाषा अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी गई है।
श्री सुंदर श्याम जी की वाणी भी साधक को इसी प्रेम-जगत की ओर ले जाती है यहाँ भक्ति केवल पूजा-पद्धति नहीं रह जाती, बल्कि हृदय की वह अवस्था बन जाती है जिसमें भक्त अपने आराध्य के प्रेम में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देता है।

योग, जप और समाधि से भी ऊपर प्रेम
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की रसिक भावना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है—प्रेम की सर्वोच्चता।
उनसे सम्बद्ध प्रसिद्ध कवित्त का आरम्भ है—
“जोग–जप–संजम–समाधि–भुक्ति–मुक्ति–सुख…”
इस पंक्ति में उनकी सम्पूर्ण आध्यात्मिक दृष्टि का सार दिखाई देता है।
यहाँ योग, जप, संयम, समाधि, भोग और मोक्ष जैसे आध्यात्मिक अथवा सांसारिक लक्ष्यों का उल्लेख करते हुए रसिक साधक को उनसे भी आगे जाने की प्रेरणा मिलती है।
क्यों?
क्योंकि रसिक भक्त के लिए अंतिम लक्ष्य केवल मुक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि श्रीराधा–कृष्ण के प्रेम की सेवा में स्थित होना है।
भुक्ति और मुक्ति से विरक्ति
सामान्य साधना में मनुष्य भगवान से सांसारिक सुख की कामना कर सकता है। कुछ साधक संसार से मुक्ति को सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं किन्तु ब्रज की रसिक भक्ति में प्रेम स्वयं साध्य बन जाता है श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की वाणी में यही भावना अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से दिखाई देती है भुक्ति अर्थात सांसारिक सुख और मुक्ति अर्थात संसार-बन्धन से मुक्ति—दोनों ही उस भक्त के लिए छोटे पड़ जाते हैं जिसने श्रीप्रिया-प्रियतम के प्रेम का स्वाद प्राप्त कर लिया हो उसकी इच्छा केवल यही रह जाती है कि उसका मन सदा श्री युगल सरकार की सेवा और स्मरण में लगा रहे।
प्रेम ही परम पुरुषार्थ
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की रसिक भावना को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि ब्रज की माधुर्य-भक्ति में प्रेम को साधन भी माना गया है और साध्य भी।
यहाँ भक्त भगवान से किसी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता।
न उसे धन चाहिए, न प्रतिष्ठा, न सिद्धि और न ही अपने लिए मुक्ति।
उसकी एकमात्र अभिलाषा होती है—
श्रीराधा–कृष्ण के प्रेम में निरन्तर स्थित रहना।
यही भावना श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की वाणी को सामान्य धार्मिक काव्य से अलग करके रसिक भक्ति की विशिष्ट भूमि पर प्रतिष्ठित करती है।
ब्रजभाषा के रसिक कवि
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी ने ब्रजभाषा में भक्ति और रस से ओत-प्रोत पद, कुण्डलियाँ तथा कवित्त रचे।
ब्रजभाषा स्वयं श्रीकृष्ण-भक्ति साहित्य की अत्यन्त समृद्ध भाषा रही है। सूरदास, नन्ददास, कुम्भनदास, रसखान और अनेक रसिक संतों ने इसी भाषा में श्रीकृष्ण की लीलाओं और ब्रज के प्रेम को अमर किया।
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की रचनाओं में भी ब्रजभाषा की—
- सहजता,
- मधुरता,
- भावप्रवणता,
- संगीतात्मकता,
- तथा रसात्मक अभिव्यक्ति
का सुंदर स्वरूप दिखाई देता है।
साधना से अधिक सहज प्रेम की महिमा
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की वाणी का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि केवल कठिन साधनाएँ ही आध्यात्मिक उपलब्धि का मापदण्ड नहीं हैं।
योग, तप, जप, संयम और समाधि का अपना महत्व हो सकता है, किन्तु जब साधक के हृदय में निष्काम प्रेम जागृत होता है, तब उसकी साधना का स्वरूप ही बदल जाता है वह भगवान को प्राप्त करने के लिए साधना नहीं करता; वह भगवान को अपना मानकर उनकी सेवा करता है यही रसिक भक्ति की विशेषता है।
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी की वाणी का संदेश
उनकी वाणी साधक को तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाती है—
प्रेम, अनन्यता और समर्पण।
प्रेम ऐसा हो जिसमें किसी फल की इच्छा न हो।
अनन्यता ऐसी हो जिसमें मन बार-बार संसार की ओर न भागे।
और समर्पण ऐसा हो जिसमें साधक अपने सुख की अपेक्षा अपने आराध्य के सुख को अधिक महत्वपूर्ण समझे।
यही भाव ब्रज के अनेक रसिक संतों की वाणी में दिखाई देता है और श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी भी इसी प्रेमधारा के प्रतिनिधि कवि प्रतीत होते हैं।
ब्रज रसिक परम्परा में स्थान
श्री सुंदर श्याम गोस्वामी जी का नाम ब्रज-वृन्दावन की रसिक साहित्यिक परम्परा से जुड़ा हुआ मिलता है।उनके नाम के साथ “गोस्वामी” उपाधि अवश्य मिलती है, किन्तु केवल इस उपाधि के आधार पर उन्हें किसी एक विशिष्ट वैष्णव सम्प्रदाय—जैसे गौड़ीय, राधावल्लभ या किसी अन्य परम्परा—से निश्चित रूप से जोड़ना उचित नहीं है जब तक स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध न हों, उन्हें वृन्दावन की व्यापक रसिक संत एवं ब्रजभाषा काव्य परम्परा के अन्तर्गत समझना अधिक तथ्यपरक है।