ब्रजभूमि की रसिक परम्परा केवल संतों और भक्तों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि अनेक ऐसे महान विद्वानों ने भी इसे समृद्ध किया जिन्होंने अपने ग्रंथों के माध्यम से श्री राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का दार्शनिक और आध्यात्मिक स्वरूप प्रस्तुत किया। ऐसे ही सम्मानित विद्वानों में श्री वागीश शास्त्री जी का नाम आदरपूर्वक लिया जाता है। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, श्री राधा-तत्त्व के मर्मज्ञ आचार्य तथा वृन्दावन के दिव्य रस के अनन्य उपासक माने जाते हैं।
श्री राधा–तत्त्व के प्रचारक
श्री वागीश शास्त्री जी ने अपने आध्यात्मिक चिंतन में श्री राधा को केवल भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति नहीं, बल्कि प्रेम की परम अधिष्ठात्री के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में श्री राधा के दिव्य स्वरूप, माधुर्य और अनन्त करुणा का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है।वे मानते थे कि श्री राधा की कृपा के बिना ब्रजरस की वास्तविक अनुभूति संभव नहीं है।
वृन्दावन की महिमा
श्री वागीश शास्त्री जी के अनुसार वृन्दावन केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि श्री राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का साकार स्वरूप है। उनकी प्रसिद्ध उक्ति में यह भाव मिलता है कि श्री राधा और श्रीकृष्ण का प्रेम ही वास्तविक वृन्दावन का स्वरूप है और यही रसिक भक्तों के हृदय का परम आश्रय है।
श्री वागीश शास्त्री जी संस्कृत भाषा के उच्चकोटि के विद्वान थे। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘श्री राधा सप्तशती‘ रसिक भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ मानी जाती है। इस ग्रंथ में श्री राधा की महिमा, वृन्दावन का आध्यात्मिक स्वरूप तथा दिव्य प्रेम के रहस्यों का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।