ब्रजभूमि की रसिक संत परम्परा में अनेक ऐसे महात्मा हुए जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य-भक्ति, निकुञ्ज-सेवा और ब्रजभाव की साधना में समर्पित कर दिया। इन्हीं श्रद्धेय संतों में श्री हित प्रेमदास जी का नाम भी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनकी वाणी में वृन्दावन धाम की महिमा, श्री युगल सरकार के नित्य-विहार और निष्काम प्रेम की अनुभूति अत्यंत मधुर रूप में प्रकट होती है।
वृन्दावन के प्रति अनन्य प्रेम
श्री हित प्रेमदास जी की वाणी का प्रमुख विषय श्रीधाम वृन्दावन है। उनके प्रसिद्ध पद “प्राण धन वृन्दावन ताको न बिसार मन“ में उन्होंने वृन्दावन को साधक के जीवन का वास्तविक धन बताया है। उनके अनुसार वृन्दावन की लताएँ, कुंज, यमुना तट और निकुञ्ज श्री राधा-कृष्ण की नित्य लीलाओं से सदैव पावन रहते हैं।

निकुञ्ज–सेवा की भावना
श्री हित प्रेमदास जी की रचनाओं में निकुञ्ज-सेवा का अत्यंत कोमल और रसपूर्ण चित्रण मिलता है। वे अपने आपको “प्रेमसखी” भाव में स्थापित कर श्री राधा-कृष्ण की अंतरंग सेवा की अभिलाषा व्यक्त करते हैं। यह भाव रसोपासना की उच्च परम्परा का परिचायक है।
भक्ति का स्वरूप
उनकी साधना का मूल आधार था—
- श्री राधारानी के चरणों में अनन्य प्रेम
- श्री राधा-कृष्ण का निरंतर स्मरण
- वृन्दावन धाम के प्रति अटूट श्रद्धा
- निकुञ्ज-सेवा की भावना
- संत-संग
- हरिनाम-संकीर्तन
- पूर्ण आत्मसमर्पण
आध्यात्मिक दर्शन
उनकी वाणी में वृन्दावन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम का नित्य धाम है। उनके अनुसार श्री राधारानी की कृपा के बिना प्रेम-रस की प्राप्ति संभव नहीं। ज्ञान, तर्क और बाह्य आडंबर से अधिक महत्व निष्काम प्रेम और समर्पण का है। भगवान की प्रसन्नता के लिए किया गया प्रत्येक कार्य ही सच्ची सेवा है।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
- रसिक संत परम्परा के श्रद्धेय भक्त
- श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य-भक्ति के उपासक
- वृन्दावन धाम के अनन्य प्रेमी
- निकुञ्ज-सेवा भाव के साधक
- विनम्र, सरल और करुणामय व्यक्तित्व
- प्रेम-प्रधान भक्ति के प्रचारक