श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के रसिक संत एवं श्री राधा नाम के अनन्य उपासक
ब्रजभूमि की रसिक संत परम्परा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन को श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी उपासना के लिए समर्पित कर दिया। उन्हीं रसिक संतों में श्री हित परमानंद दास जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। वे श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित रसिक संत थे। उनकी वाणी में श्री राधा महारानी के प्रति अनन्य प्रेम, ब्रजधाम की महिमा तथा रसोपासना का अत्यंत मधुर चित्रण मिलता है।
श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय से संबंध
श्री हित परमानंद दास जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय की प्रेममयी साधना को समर्पित किया। इस सम्प्रदाय में श्री राधा को परम आराध्या माना जाता है तथा निष्काम प्रेम को सर्वोच्च साधना का स्वरूप स्वीकार किया जाता है।

श्री राधा नाम के अनन्य भक्त
श्री हित परमानंद दास जी की वाणी में श्री राधा नाम का विशेष महत्व मिलता है। उनका प्रसिद्ध दोहा—
“राधा राधे राधिके, राधे रूप निधान।
राधा–राधा मंत्र निज, हित परमानंद प्रान॥“
यह स्पष्ट करता है कि उनके लिए ‘राधा‘ नाम ही जीवन का प्राण और सर्वोच्च मंत्र था। वे मानते थे कि श्री राधा नाम का स्मरण भक्त के हृदय को दिव्य प्रेम से भर देता है।
रसोपासना और भक्ति
श्री हित परमानंद दास जी की साधना का मूल आधार श्री राधा महारानी की प्रेममयी सेवा और श्री राधावल्लभ लाल के युगल स्वरूप का निरंतर चिंतन था। उनकी पदावली में निकुञ्ज-लीला, श्रृंगार-रस, प्रेम-भक्ति और ब्रजभाव का अत्यंत मधुर एवं रसपूर्ण वर्णन मिलता है।
श्री हित परमानंद दास जी ने अनेक पद, दोहे और भक्तिमय रचनाएँ लिखीं। उनकी भाषा सरल, मधुर और ब्रजभाषा की रसधारा से परिपूर्ण है। उनकी रचनाओं में प्रमुख विषय हैं—
- श्री राधा नाम की महिमा
- श्री राधावल्लभ लाल की उपासना
- ब्रजधाम का गौरव
- निकुञ्ज-लीला
- प्रेम और समर्पण
- रसोपासना
- विनम्र भक्ति
उनकी पदावली आज भी रसिक भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक गाई और पढ़ी जाती है।
भक्ति दर्शन
उनके अनुसार श्री राधा की कृपा से ही श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम का अनुभव संभव है।उन्होंने राधा नाम को साधक के जीवन का परम मंत्र बताया।भक्ति का वास्तविक स्वरूप निष्काम प्रेम, समर्पण और सेवा है।उन्होंने वृन्दावन की प्रेममयी संस्कृति और रसभाव को साधना का आधार माना।