ब्रजभूमि की रसिक संत परम्परा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की मधुर निकुंज लीलाओं के चिंतन, भजन और सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं महान संतों में श्री हित गोपाल दास जी का अत्यंत सम्मानित स्थान है। वे “सेवा कुंज वाले” नाम से प्रसिद्ध हैं और उनकी रचनाओं में श्री राधारानी के प्रति अनन्य प्रेम, वृंदावन धाम की महिमा तथा राधा-नाम की दिव्य शक्ति का अत्यंत मधुर वर्णन मिलता है।

श्री हित गोपाल दास जी का परिचय
श्री हित गोपाल दास जी ब्रज की रसिक संत परंपरा के प्रमुख भक्त-कवि थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन श्री सेवा कुंज, वृंदावन में भजन-साधना करते हुए व्यतीत किया। उनकी साधना का मूल आधार श्री राधारानी की अनन्य शरणागति, निकुंज-रस का चिंतन तथा युगल सरकार की नित्य लीलाओं का भावपूर्ण स्मरण था।
‘निकुंज रस वल्लरी‘ के रचयिता
श्री हित गोपाल दास जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति “निकुंज रस वल्लरी“ है। इस ग्रंथ में श्री राधारानी की सर्वोच्च महिमा, सेवा कुंज की दिव्यता, वृंदावन धाम की महिमा और निकुंज-रस का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है। वर्तमान में इस ग्रंथ के अनेक पद ब्रज रस पर प्रकाशित हैं और रसिक समाज में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाए जाते हैं।
श्री राधारानी के प्रति अनन्य निष्ठा
श्री हित गोपाल दास जी की वाणी में श्री राधारानी ही जीवन का एकमात्र आश्रय हैं। उनका प्रसिद्ध पद—
“हमारी सर्वस राधारानी“
इस भाव को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है। वे कहते हैं कि श्री राधारानी ही उनका सर्वस्व हैं और उन्हीं की कृपा से उन्हें श्रीधाम वृंदावन का वास प्राप्त हुआ। वे स्वयं को निर्धन बताते हुए कहते हैं कि उनका वास्तविक धन केवल श्री श्यामा ही हैं।
राधा–नाम की महिमा
श्री हित गोपाल दास जी ने अपनी अनेक रचनाओं में “राधा–राधा“ नाम के जप को सर्वोच्च साधना बताया है।
उनकी प्रसिद्ध वाणी—
“हमारो धन राधा–राधा नाम“
में वे स्पष्ट कहते हैं कि उनका वास्तविक धन केवल श्री राधा का नाम है। संसार की समस्त संपत्तियाँ नश्वर हैं, किन्तु राधा-नाम ही साधक का अमूल्य आध्यात्मिक धन है।
इसी प्रकार उनके पद—
“जपौ मन राधा राधा नाम“
में वे साधकों को जीवन व्यर्थ न गँवाकर निरंतर श्री राधा नाम का जप करने की प्रेरणा देते हैं।
वृंदावन धाम के प्रति प्रेम
श्री हित गोपाल दास जी की वाणी में वृंदावन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि श्री राधा-कृष्ण का नित्य निवास है। उनके पद—
“वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं“
में वे स्पष्ट कहते हैं कि वृंदावन से बढ़कर संसार में कहीं भी वास्तविक सुख नहीं है। यमुना, वंशीवट, सेवा कुंज और ब्रज की प्रत्येक रज उनके लिए परम पूजनीय है।