श्री हित कृष्णदास जी राधावल्लभ सम्प्रदाय की रसिक परम्परा के आदरणीय संतों में स्मरण किए जाते हैं। उनका जीवन श्रीराधा-कृष्ण की माधुर्य-उपासना, वृन्दावन के प्रति अनन्य प्रेम तथा गुरु-परम्परा के प्रति पूर्ण समर्पण का अनुपम उदाहरण है राधावल्लभ परम्परा में भक्ति का मूल आधार श्रीराधा के चरणों में प्रेमपूर्ण समर्पण है, और श्री हित कृष्णदास जी ने इसी प्रेममयी साधना को अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बनाया।
राधावल्लभ सम्प्रदाय की प्रेम परम्परा
श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित राधावल्लभ सम्प्रदाय में प्रेम को साधना का सर्वोच्च स्वरूप माना गया है। इस परम्परा में भगवान श्रीराधावल्लभ लाल की सेवा, निकुञ्ज-लीला का स्मरण तथा सहज प्रेम-भक्ति को विशेष महत्व प्राप्त है श्री हित कृष्णदास जी इसी दिव्य परम्परा के साधक थे। उनके जीवन का प्रत्येक पक्ष प्रेम, सेवा और रसोपासना से अनुप्राणित था।
वृन्दावन के प्रति अनन्य श्रद्धा
श्री हित कृष्णदास जी वृन्दावन को केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि श्रीराधा-कृष्ण की नित्य लीला-भूमि मानते थे।
उनके अनुसार—
- ब्रज की रज भक्त के जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
- वृन्दावन का प्रत्येक कुंज दिव्य प्रेम का प्रतीक है।
- यमुना महारानी की कृपा से भक्ति पुष्ट होती है।
- ब्रजवास स्वयं एक महान साधना है।
माधुर्य भक्ति और निकुञ्ज–रस
श्री हित कृष्णदास जी की साधना का मूल आधार माधुर्य–रस था।
वे मानते थे कि—
- श्रीराधा की कृपा के बिना श्रीकृष्ण की पूर्ण अनुभूति संभव नहीं।
- निकुञ्ज-लीलाओं का स्मरण साधक के हृदय को प्रेममय बनाता है।
- गुरु-कृपा से ही दिव्य रस की प्राप्ति होती है।
- प्रेम ही भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है।
सरलता और विनम्रता का आदर्श
राधावल्लभ परम्परा के अन्य रसिक संतों की भाँति श्री हित कृष्णदास जी का जीवन भी अत्यन्त सरल, विनम्र और निष्कपट था।
वे बाहरी आडम्बर से दूर रहकर—
- नाम-स्मरण,
- भजन,
- संत-संग,
- सेवा,
- तथा श्रीराधा-कृष्ण के ध्यान
को ही वास्तविक साधना मानते थे।