ब्रजभूमि की पावन धरा सदैव से ऐसे संतों की भूमि रही है, जिन्होंने अपने जीवन को श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति के लिए समर्पित कर दिया। इन महान रसिक संतों में श्री सेवक जी (दामोदर दास) का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।
श्री सेवक जी श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के महान रसिक भक्त थे और श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के परम कृपापात्र शिष्य माने जाते हैं। उनका जीवन अद्भुत गुरु निष्ठा, अनन्य भक्ति और श्री राधा-कृष्ण प्रेम का अनुपम उदाहरण है।
विशेष बात यह है कि श्री सेवक जी ने श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं किया था, फिर भी वे उनके सिद्धांतों और रसोपासना के सबसे बड़े ज्ञाताओं में गिने जाते हैं। उनकी वाणी आज भी श्री हित चौरासी के साथ श्रद्धापूर्वक पढ़ी जाती है।
श्री सेवक जी का जन्म लगभग संवत् 1634 (लगभग 1577 ई.) में मध्यप्रदेश के जबलपुर क्षेत्र के गढ़ा ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ माना जाता है।
बाल्यकाल से ही उनके हृदय में भगवान के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति भावना थी। उनका मन सांसारिक विषयों की अपेक्षा भगवान के नाम, संतों की संगति और आध्यात्मिक चिंतन में अधिक लगता था।
उनके परिवार में ही श्री चतुर्भुज दास जी नामक एक अन्य भक्त भी थे, जो स्वयं अत्यंत भक्ति परायण और साधु स्वभाव के थे। दोनों के जीवन में भक्ति का विशेष प्रभाव दिखाई देता था।
श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के प्रति आकर्षण
एक बार श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के कुछ शिष्य संत भ्रमण करते हुए श्री सेवक जी के गाँव पहुँचे। उन्होंने वहाँ श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी द्वारा रचित श्री राधा-कृष्ण प्रेम और निकुंज लीला से संबंधित मधुर पदों का गायन किया।
इन पदों को सुनकर श्री सेवक जी और श्री चतुर्भुज दास जी के हृदय में श्री वृन्दावन और श्री राधा-कृष्ण प्रेम की तीव्र लालसा उत्पन्न हुई। उन्होंने निश्चय किया कि वे वृन्दावन जाकर श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी की शरण ग्रहण करेंगे।
लेकिन जब वे वृन्दावन पहुँचे, तब तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी अपनी नित्य लीला में प्रवेश कर चुके थे।
अनन्य गुरु भक्ति और श्री हित हरिवंश जी की कृपा
श्री चतुर्भुज दास जी ने श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के पुत्र श्री वनचंद्र दास जी से दीक्षा लेने का विचार किया, लेकिन श्री सेवक जी ने दृढ़ निश्चय किया कि उनके गुरु केवल श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी ही हैं।
उनकी गुरु निष्ठा इतनी अटल थी कि उन्होंने किसी अन्य से दीक्षा स्वीकार नहीं की।
उनकी इसी अनन्य भक्ति और विश्वास से प्रसन्न होकर श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी ने स्वप्न में उन्हें मंत्र प्रदान किया और दिव्य वृन्दावन दर्शन कराकर कृपा प्रदान की।
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि सच्ची श्रद्धा और पूर्ण समर्पण से भक्त को भगवान और गुरु की कृपा प्राप्त होती है।
श्री सेवक जी और वृन्दावन धाम
श्री सेवक जी के हृदय में श्री वृन्दावन धाम के प्रति अत्यंत प्रेम था।
उनकी साधना का केंद्र था—
- श्री राधा-कृष्ण की प्रेम भक्ति
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी की रसोपासना
- नाम स्मरण
- संत सेवा
- निकुंज लीला चिंतन
उनका जीवन पूर्ण रूप से श्री राधावल्लभ लाल जी की सेवा और प्रेम रस में समर्पित था।
श्री सेवक जी की वाणी (सेवक वाणी)
श्री सेवक जी की सबसे बड़ी आध्यात्मिक देन उनकी अमूल्य रचना “श्री सेवक वाणी“ है।
इस वाणी में श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी की रसोपासना, श्री राधा-कृष्ण प्रेम और श्याम-श्यामा की अभिन्नता का सुंदर वर्णन मिलता है।
श्री सेवक जी की वाणी में यह भाव मिलता है कि श्री राधा और श्री कृष्ण एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। दोनों का प्रेम ही ब्रज रस का मूल स्वरूप है।
श्री सेवक जी का वृन्दावन आगमन
श्री वनचंद्र दास जी ने जब श्री सेवक जी की वाणी सुनी तो वे अत्यंत प्रभावित हुए और उन्हें वृन्दावन आने का निमंत्रण दिया।
श्री सेवक जी वृन्दावन आए और श्री राधावल्लभ लाल जी के दर्शन किए।
वे वृन्दावन में लगभग 10 दिन तक रहे, लेकिन इतने अल्प समय में भी उनका प्रभाव सम्पूर्ण सम्प्रदाय पर अमिट हो गया।
श्री सेवक जी का निकुंज प्रवेश
मान्यता के अनुसार श्री सेवक जी ने वृन्दावन के रास मंडल क्षेत्र में ध्यान अवस्था में रहते हुए अपनी लौकिक लीला का संवरण किया और श्री राधा-कृष्ण की नित्य लीला में प्रवेश किया।
उनका जीवन आज भी भक्तों के लिए गुरु प्रेम, भक्ति और समर्पण का आदर्श है।