श्री सनातन गोस्वामी जी (1488–1558 ई.) गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के महान आचार्य, श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य तथा वृन्दावन के षड्गोस्वामियों में अग्रणी माने जाते हैं। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्रीकृष्ण-भक्ति, श्रीधाम वृन्दावन की पुनः प्रतिष्ठा, वैष्णव आचार के प्रचार तथा शास्त्रीय भक्ति साहित्य की रचना में समर्पित कर दिया। उनकी तपस्या, विनम्रता और निष्काम सेवा ने उन्हें सम्पूर्ण वैष्णव जगत में अमर स्थान प्रदान किया।
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रिय शिष्य
श्री सनातन गोस्वामी जी का जीवन श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से पूर्ण रूप से परिवर्तित हुआ। महाप्रभु ने उन्हें वृन्दावन जाकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थलियों का संरक्षण, वैष्णव सिद्धान्तों का प्रचार तथा भक्तों के लिए आदर्श आचरण स्थापित करने का दायित्व सौंपा उन्होंने गुरु की आज्ञा को अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म मानकर आजीवन उसी का पालन किया। उनका जीवन गुरु-भक्ति, त्याग और पूर्ण समर्पण का अनुपम उदाहरण है।

वृन्दावन की पुनः प्रतिष्ठा में महान योगदान
श्री सनातन गोस्वामी जी का सबसे बड़ा योगदान श्रीधाम वृन्दावन की प्राचीन लीलास्थलियों को पुनः खोजकर उन्हें भक्तों के लिए सुलभ बनाना था।
उन्होंने—
- श्री मदनमोहन जी की सेवा का विस्तार किया।
- ब्रज के अनेक पावन स्थलों का संरक्षण किया।
- वृन्दावन की परिक्रमा और ब्रज-भक्ति को संगठित स्वरूप प्रदान किया।
- साधकों को ब्रजवास और भगवान के नाम-स्मरण का महत्व बताया।
हरि–भक्ति–विलास की अमूल्य देन
श्री सनातन गोस्वामी जी का प्रसिद्ध ग्रंथ हरि–भक्ति–विलास वैष्णव आचार-संहिता के रूप में अत्यन्त सम्मानित है। इसमें भक्ति, साधना, पूजा, व्रत, नाम-जप, वैष्णवाचार तथा भगवान के प्रति शरणागति का विस्तृत वर्णन मिलता है यह ग्रंथ आज भी गौड़ीय वैष्णव परम्परा के प्रमुख आधार-ग्रंथों में गिना जाता है।
शरणागति के छह अंग
श्री सनातन गोस्वामी जी ने हरि–भक्ति–विलास में भगवान की शरणागति के छह अंगों का अत्यन्त सुंदर वर्णन किया है। उनके अनुसार सच्चा भक्त—
- भगवान की इच्छा के अनुकूल आचरण करता है।
- भक्ति के प्रतिकूल कार्यों का त्याग करता है।
- भगवान को अपना रक्षक मानता है।
- भगवान को अपना पालनकर्ता स्वीकार करता है।
- स्वयं को पूर्णतः भगवान को समर्पित कर देता है।
- अहंकार और दम्भ का त्याग करता है।
श्रीकृष्ण की अद्भुत कृपा
श्री सनातन गोस्वामी जी के जीवन से जुड़ी अनेक दिव्य घटनाएँ ब्रज परम्परा में प्रसिद्ध हैं। उनमें से एक अत्यन्त लोकप्रिय प्रसंग यह है कि जब वे कठोर तपस्या में लीन थे और कई दिनों तक भोजन नहीं किया, तब स्वयं श्रीकृष्ण गोपाल बालक के रूप में उनके लिए दूध लेकर आए इस घटना से यह संदेश मिलता है कि भगवान अपने निष्काम भक्तों की सेवा और रक्षा स्वयं करते हैं।
श्रीराधारानी की असीम कृपा
एक अन्य प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार श्रीरूप गोस्वामी जी श्री सनातन गोस्वामी जी के लिए खीर बनाना चाहते थे, पर आवश्यक सामग्री उपलब्ध नहीं थी। तब स्वयं श्रीराधारानी गोपी के वेश में दूध, चावल और शक्कर लेकर पहुँचीं और भक्तों की मनोकामना पूर्ण की।
यह प्रसंग भक्त और भगवान के मधुर प्रेम-संबंध का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
श्री गोपेश्वर महादेव के प्रति श्रद्धा
श्री सनातन गोस्वामी जी प्रतिदिन श्री गोपेश्वर महादेव के दर्शन करने जाते थे। वृद्धावस्था में जब यह कठिन हो गया, तब परम्परा के अनुसार भगवान शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन देकर निकट ही बाँखण्डी महादेव के रूप में प्रकट होकर उनकी सेवा स्वीकार की। यह घटना उनकी अटूट भक्ति और भगवान की करुणा का सुंदर उदाहरण है।
श्री सनातन गोस्वामी जी की साहित्यिक विरासत
श्री सनातन गोस्वामी जी ने अनेक महत्वपूर्ण वैष्णव ग्रंथों की रचना और संपादन किया, जिनमें प्रमुख हैं—
- हरि–भक्ति–विलास
- बृहद्–भागवतामृत
- वैष्णव तोषणी (भागवत पर टीका)
इन ग्रंथों ने भक्ति-दर्शन, वैष्णव साधना और गौड़ीय सिद्धान्तों को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया।