श्री विहारिवल्लभ जी वृंदावन के परम आदरणीय रसिक संत थे। वे हरिदासी संप्रदाय की उस महान परंपरा से जुड़े थे जिसने श्री स्वामी हरिदास जी की मधुर भक्ति धारा को आगे बढ़ाया। उनका सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की सेवा, भजन, साधना और रसिक साहित्य की रचना में व्यतीत हुआ। वे सांसारिक प्रसिद्धि से दूर रहकर प्रेम, विनम्रता और भक्ति को ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते थे। वे हरिदासी संप्रदाय के प्रतिष्ठित रसिक संत, भक्त कवि तथा श्री राधा-कृष्ण के अनन्य उपासक थे।
गुरु–शिष्य परंपरा
श्री विहारिवल्लभ जी, श्री भगवत रसिक देव जी के परम शिष्य थे। गुरु की कृपा से उन्होंने निकुंज-रस, सखी भाव और राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं का गहन अध्ययन एवं अनुभव प्राप्त किया।
वे मानते थे कि गुरु ही वह दिव्य माध्यम हैं जो साधक को भगवान की प्रेममयी भक्ति तक पहुँचाते हैं। इसलिए उनकी वाणी में गुरु-भक्ति और गुरु-कृपा का विशेष महत्व दिखाई देता है।
हरिदासी संप्रदाय से संबंध
हरिदासी संप्रदाय की स्थापना महान संत स्वामी श्री हरिदास जी ने की थी। इस परंपरा में श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य उपासना, संगीत, पद-कीर्तन और निकुंज-लीला का विशेष महत्व है।
श्री विहारिवल्लभ जी ने इसी परंपरा के सिद्धांतों को अपनाते हुए प्रेम-भक्ति और रसोपासना का प्रचार किया। उनकी साधना में बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक प्रेम, भक्ति और समर्पण का विशेष स्थान था।
‘श्री विहारिवल्लभ जी की वाणी‘
श्री विहारिवल्लभ जी की रचनाओं का संकलन “श्री विहारिवल्लभ जी की वाणी“ के नाम से प्रसिद्ध है। इस वाणी में प्रमुख रूप से निम्न विषयों का सुंदर वर्णन मिलता है—
- श्री राधा-कृष्ण की निकुंज लीलाएँ।
- वृंदावन धाम की दिव्य महिमा।
- युगल सरकार के सौंदर्य और माधुर्य का वर्णन।
- प्रेम-भक्ति और आत्मसमर्पण।
- रसिक साधना का स्वरूप।
- संत-संग और गुरु-कृपा का महत्व।
उनकी भाषा ब्रजभाषा की मधुरता से परिपूर्ण है और प्रत्येक पद में गहन आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव होता है।
निकुंज भक्ति का स्वरूप
श्री विहारिवल्लभ जी की साधना का मुख्य आधार निकुंज भक्ति था। वे श्री राधा-कृष्ण की नित्य लीलाओं का ध्यान, चिंतन और कीर्तन करते हुए साधकों को दिव्य प्रेम की अनुभूति कराने का प्रयास करते थे। उनके अनुसार भगवान की प्राप्ति केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम, सेवा और पूर्ण समर्पण से संभव है।