वृन्दावन की पावन भूमि ने अनेक ऐसे रसिक संतों और भक्तों को जन्म दिया, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री राधारानी और श्री राधावल्लभ लाल की प्रेममयी सेवा में समर्पित कर दिया। इन्हीं श्रद्धेय भक्तों में श्री विमलबाई का नाम भी आदर और श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। वे श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय की एक रसिक भक्त थीं, जिनकी साधना का मूल आधार श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य-भक्ति, वृन्दावन के प्रति अनन्य प्रेम और निष्काम सेवा था।
राधावल्लभ सम्प्रदाय से जुड़ाव
श्री विमलबाई का आध्यात्मिक जीवन राधावल्लभ सम्प्रदाय की प्रेमप्रधान परम्परा से अनुप्राणित था। इस सम्प्रदाय में श्री राधारानी को सर्वोच्च आराध्य मानते हुए श्री राधावल्लभ लाल की सेवा, नित्य-विहार का चिंतन और प्रेम-रस की साधना को विशेष महत्व दिया जाता है। यही भाव श्री विमलबाई की भक्ति का भी आधार था।
वृन्दावन धाम के प्रति प्रेम
श्री विमलबाई के लिए वृन्दावन केवल एक तीर्थ नहीं था, बल्कि श्री राधा-कृष्ण का नित्य विहार-स्थल था। वे ब्रज की रज, यमुना तट, निकुञ्जों और संत-समागम को दिव्य कृपा का स्वरूप मानती थीं। उनका विश्वास था कि वृन्दावन में किया गया प्रत्येक नाम-स्मरण और सेवा साधक के हृदय को निर्मल बनाती है तथा उसे श्री राधारानी की कृपा के समीप ले जाती है।