पुष्टिमार्ग के रसिक संत एवं ब्रज–प्रेम के अमर गायक
ब्रजभूमि की रसिक संत परम्परा में अनेक ऐसे भक्त हुए जिन्होंने अपने पदों और साधना के माध्यम से श्री राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का अमृत समाज को प्रदान किया। इन्हीं महान संतों में श्री वल्लभ दास जी का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। वे पुष्टिमार्ग (वल्लभ सम्प्रदाय) के एक प्रतिष्ठित रसिक संत थे। उनकी वाणी में ब्रजधाम का अनुपम सौन्दर्य, श्री राधा-कृष्ण की नित्य निकुञ्ज-लीलाएँ तथा श्री राधारानी के चरणों की महिमा अत्यंत भावपूर्ण रूप में प्रकट होती है।
श्री वल्लभ दास जी का परिचय
उपलब्ध पारम्परिक जानकारी के अनुसार श्री वल्लभ दास जी ब्रज के रसिक संत थे तथा उनका सम्बन्ध पुष्टिमार्ग अथवा वल्लभ सम्प्रदाय से माना जाता है। उनका सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी उपासना, ब्रजवास की महिमा और रसोपासना के प्रचार में समर्पित रहा। उनके जीवन के विस्तृत ऐतिहासिक विवरण सीमित उपलब्ध हैं, किन्तु उनकी वाणी आज भी भक्तों के बीच अत्यन्त लोकप्रिय है।
पुष्टिमार्ग और ब्रजभक्ति
श्री वल्लभ दास जी की साधना का केन्द्र श्रीकृष्ण के साथ श्री राधारानी की मधुर उपासना थी। उनके पदों में ब्रजभूमि के प्रति अगाध प्रेम दिखाई देता है। वे ब्रजवास को परम सौभाग्य मानते हैं और भक्तों को ब्रजधाम के प्रेम में स्थिर रहने की प्रेरणा देते हैं।
श्री राधा–कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम
उनकी वाणी का मूल स्वर श्री युगल सरकार के प्रति निष्काम प्रेम है। वे केवल भगवान के ऐश्वर्य का नहीं, बल्कि उनके मधुर, सहज और प्रेमपूर्ण स्वरूप का गान करते हैं। उनके अनेक पदों में यह भाव मिलता है कि श्रीकृष्ण की पूर्ण माधुर्यता भी श्री राधारानी के साथ ही सम्पूर्ण होती है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में श्री राधा की महिमा अत्यन्त उच्च स्थान पर दिखाई देती है।

ब्रजवास की महिमा
श्री वल्लभ दास जी ने ब्रजधाम को समस्त दिव्य लोकों से श्रेष्ठ बताया है। उनकी वाणी में बार-बार यह प्रार्थना मिलती है कि भक्त को जीवनभर ब्रज में निवास और श्रीकृष्ण की वंशी-ध्वनि का स्मरण प्राप्त हो। उनके अनुसार ब्रज की धूल, कुंज, यमुना तट और गोप-गोपियों का प्रेम ही वास्तविक आध्यात्मिक सम्पदा है।
प्रमुख पद एवं भाव
उनकी वाणी के कुछ प्रसिद्ध पदों के शीर्षक इस प्रकार हैं—
- भरोसो वल्लभ ही को राखो
- मथुरा प्रभु ने ब्रजवास दियो
- श्याम श्याम रटते रहौ
- बंदौं श्री पद पद्म उदार
- मोहि अति लागत श्री बन निकौ
- नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको
इन पदों में ब्रजवास, श्री राधा-कृष्ण का प्रेम, ब्रज की महिमा और निष्काम भक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है।