वृन्दावन धाम की रसिक संत परम्परा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन को श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति और निकुञ्ज-रस की साधना के लिए समर्पित कर दिया। उन्हीं महान संतों में श्री ललित विहारिणी, जिन्हें श्री ललितमोहिनीदास जी के नाम से भी जाना जाता है, का स्थान अत्यन्त सम्माननीय है। वे हरिदासी सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य, टटिया स्थान के महन्त तथा रसोपासना के महान साधक थे। उनका जीवन वैराग्य, गुरु-भक्ति और ब्रजरस की साधना का प्रेरक उदाहरण है।

श्री ललितमोहिनीदास जी का मन युवावस्था से ही सांसारिक जीवन में नहीं लगा। अल्प आयु में ही उन्होंने संसार के क्षणभंगुर सुखों का त्याग कर भगवान की भक्ति का मार्ग अपनाने का निश्चय किया। सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर वे श्रीधाम वृन्दावन आ पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की सेवा और भजन-साधना के लिए समर्पित कर दिया।
उनका यह त्याग आज भी साधकों को यह प्रेरणा देता है कि सच्ची आध्यात्मिक यात्रा भीतर की पुकार से प्रारम्भ होती है।
श्री ललित किशोरीदास जी से दीक्षा
वृन्दावन पहुँचने के पश्चात् श्री ललितमोहिनीदास जी ने हरिदासी सम्प्रदाय के महान संत श्री ललित किशोरीदास जी के चरणों में शरण ग्रहण की। उन्होंने उन्हीं से विधिवत् दीक्षा प्राप्त की और गुरु के निर्देशन में भजन, ध्यान, सेवा तथा रसोपासना का अभ्यास प्रारम्भ किया।
गुरु-सेवा और आज्ञापालन उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। वे मानते थे कि गुरु की कृपा के बिना ब्रजरस और दिव्य प्रेम की अनुभूति संभव नहीं है।
टटिया स्थान के महन्त एवं हरिदासी सम्प्रदाय के अष्टम आचार्य
संवत १८२३ में श्री ललित किशोरीदास जी के अंतर्धान के पश्चात् श्री ललितमोहिनीदास जी को टटिया स्थान का महन्त नियुक्त किया गया। इसी के साथ वे हरिदासी सम्प्रदाय के अष्टम आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
उन्होंने अपने आचार्यत्व काल में हरिदासी परम्परा की भक्ति, सेवा और रसोपासना को नई ऊर्जा प्रदान की। उनके नेतृत्व में अनेक साधकों ने श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य भक्ति का मार्ग अपनाया और वृन्दावन की संत परम्परा और अधिक समृद्ध हुई।
रसोपासना और आध्यात्मिक जीवन
श्री ललित विहारिणी जी का सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की निकुञ्ज-लीलाओं के ध्यान, नाम-स्मरण और प्रेममयी सेवा में व्यतीत हुआ। वे मानते थे कि भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप निष्काम प्रेम और अंतरंग सेवा है।
उनकी साधना के प्रमुख आधार थे—
- श्री राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति
- गुरु-सेवा
- नाम-स्मरण
- निकुञ्ज-भाव
- ब्रजवास
- संत-संग
संतों के प्रति सम्मान
श्री ललित विहारिणी जी की दृष्टि में प्रत्येक संत भगवान की कृपा का माध्यम था। उनकी प्रसिद्ध उक्ति—
“सब ही संत हैं रस भरे, सब ही रस की खानि।“
यह संदेश देती है कि प्रत्येक सच्चे संत के भीतर ईश्वर-प्रेम का अमूल्य रस विद्यमान होता है। इसलिए संतों के प्रति सम्मान, विनम्रता और सेवा का भाव प्रत्येक साधक के जीवन का अनिवार्य अंग होना चाहिए।
प्रारम्भिक जीवन एवं वैराग्य
श्री ललितमोहिनीदास जी का मन युवावस्था से ही सांसारिक जीवन में नहीं लगा। अल्प आयु में ही उन्होंने संसार के क्षणभंगुर सुखों का त्याग कर भगवान की भक्ति का मार्ग अपनाने का निश्चय किया। सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर वे श्रीधाम वृन्दावन आ पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की सेवा और भजन-साधना के लिए समर्पित कर दिया।
उनका यह त्याग आज भी साधकों को यह प्रेरणा देता है कि सच्ची आध्यात्मिक यात्रा भीतर की पुकार से प्रारम्भ होती है।
श्री ललित किशोरीदास जी से दीक्षा
वृन्दावन पहुँचने के पश्चात् श्री ललितमोहिनीदास जी ने हरिदासी सम्प्रदाय के महान संत श्री ललित किशोरीदास जी के चरणों में शरण ग्रहण की। उन्होंने उन्हीं से विधिवत् दीक्षा प्राप्त की और गुरु के निर्देशन में भजन, ध्यान, सेवा तथा रसोपासना का अभ्यास प्रारम्भ किया।
गुरु-सेवा और आज्ञापालन उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। वे मानते थे कि गुरु की कृपा के बिना ब्रजरस और दिव्य प्रेम की अनुभूति संभव नहीं है।
टटिया स्थान के महन्त एवं हरिदासी सम्प्रदाय के अष्टम आचार्य
संवत १८२३ में श्री ललित किशोरीदास जी के अंतर्धान के पश्चात् श्री ललितमोहिनीदास जी को टटिया स्थान का महन्त नियुक्त किया गया। इसी के साथ वे हरिदासी सम्प्रदाय के अष्टम आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
उन्होंने अपने आचार्यत्व काल में हरिदासी परम्परा की भक्ति, सेवा और रसोपासना को नई ऊर्जा प्रदान की। उनके नेतृत्व में अनेक साधकों ने श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य भक्ति का मार्ग अपनाया और वृन्दावन की संत परम्परा और अधिक समृद्ध हुई।
रसोपासना और आध्यात्मिक जीवन
श्री ललित विहारिणी जी का सम्पूर्ण जीवन श्री राधा-कृष्ण की निकुञ्ज-लीलाओं के ध्यान, नाम-स्मरण और प्रेममयी सेवा में व्यतीत हुआ। वे मानते थे कि भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप निष्काम प्रेम और अंतरंग सेवा है।
उनकी साधना के प्रमुख आधार थे—
- श्री राधा-कृष्ण की अनन्य भक्ति
- गुरु-सेवा
- नाम-स्मरण
- निकुञ्ज-भाव
- ब्रजवास
- संत-संग
संतों के प्रति सम्मान
श्री ललित विहारिणी जी की दृष्टि में प्रत्येक संत भगवान की कृपा का माध्यम था। उनकी प्रसिद्ध उक्ति—
“सब ही संत हैं रस भरे, सब ही रस की खानि।“
यह संदेश देती है कि प्रत्येक सच्चे संत के भीतर ईश्वर-प्रेम का अमूल्य रस विद्यमान होता है। इसलिए संतों के प्रति सम्मान, विनम्रता और सेवा का भाव प्रत्येक साधक के जीवन का अनिवार्य अंग होना चाहिए।