श्री रूप सखी जी का जन्म बुन्देलखण्ड में हुआ माना जाता है। प्रारम्भ से ही उनका मन सांसारिक विषयों की अपेक्षा भगवान श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति में अधिक रमता था। बाद में वे हरिदासी संप्रदाय के महान रसिकाचार्य श्री स्वामी रसिक देव जी की शरण में पहुँचे और उनके कृपापात्र शिष्य बने। गुरु-कृपा प्राप्त होने के पश्चात उनका सम्पूर्ण जीवन श्रीधाम वृंदावन में नित्यविहार रस, भजन, ध्यान और निकुंज-सेवा के चिंतन में व्यतीत हुआ।
गुरु–भक्ति और साधना
श्री रूप सखी जी अपने गुरु श्री स्वामी रसिक देव जी के प्रति अत्यंत समर्पित थे। वे मानते थे कि गुरु की कृपा के बिना श्री राधा-कृष्ण के नित्यविहार का वास्तविक अनुभव संभव नहीं है। उन्होंने अपने गुरु-भाई श्री ललित किशोरी देव जी के प्रति भी गहन कृतज्ञता व्यक्त करते हुए लिखा—
“श्री ललित किशोरी की कृपा, पायौ नित्य विहार।
रसिक शिरोमणि महल कौ, आनन्द अमित अपार॥“
इस पद में वे स्वीकार करते हैं कि गुरु-परंपरा की कृपा से ही उन्हें नित्यविहार रस का दिव्य अनुभव प्राप्त हुआ।
दिव्य सखी स्वरूप की अनुभूति
हरिदासी परंपरा में वर्णित एक प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार, एक बार श्री रूप सखी जी वृंदावन में एक तमाल वृक्ष के नीचे गुरु-मंत्र का स्मरण करते हुए गहन समाधि में लीन हो गए। समाधि की अवस्था में उन्हें अपना दिव्य सखी स्वरूप प्रकट हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि वे दिव्य सखी रूप में श्री यमुना तट से होते हुए रंगमहल पहुँचे, जहाँ श्री राधा-कृष्ण विराजमान थे और अष्टसखियाँ उनकी सेवा में उपस्थित थीं। यह अनुभव उनकी साधना के उच्चतम आध्यात्मिक स्तर का प्रतीक माना जाता है। हरिदासी रसिक परंपरा इस प्रसंग को नित्यविहार-भाव की सिद्धि के रूप में देखती है।
श्री रूप सखी जी की वाणी‘
श्री रूप सखी जी की रचनाएँ “श्री रूप सखी जी की वाणी“ के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनकी वाणी में मुख्य रूप से निम्न विषयों का अत्यंत मधुर वर्णन मिलता है—
- श्री राधा-कृष्ण की निकुंज लीलाएँ।
- नित्यविहार रस।
- सखी भाव की उपासना।
- श्रीधाम वृंदावन की महिमा।
- गुरु-कृपा का महत्व।
- प्रेम, विनम्रता और समर्पण।
उनके पदों की भाषा ब्रजभाषा है, जो रस, माधुर्य और आध्यात्मिक अनुभूति से परिपूर्ण है।