भारतीय भक्ति साहित्य में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने जाति, धर्म और सम्प्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर ईश्वर-प्रेम का संदेश दिया। ऐसे ही महान भक्त-कवि थे श्री रहीम दास जी, जिनका पूरा नाम अब्दुर्रहीम ख़ान–ए–ख़ाना था। वे मुगल सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक होने के साथ-साथ ब्रजभाषा के उत्कृष्ट कवि और श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त भी थे। उनकी रचनाओं में नीति, भक्ति, प्रेम और मानवीय संवेदना का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
श्री रहीम दास जी का जन्म 17 दिसम्बर 1556 को हुआ। उनके पिता बैरम ख़ाँ मुगल सम्राट अकबर के संरक्षक और सेनापति थे। बाल्यकाल से ही रहीम ने फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और ब्रजभाषा सहित अनेक भाषाओं का अध्ययन किया। विद्वत्ता, विनम्रता और साहित्य-प्रेम ने उन्हें कम आयु में ही विशिष्ट पहचान दिलाई।
अकबर के नवरत्नों में स्थान
रहीम दास केवल कवि ही नहीं, बल्कि कुशल सेनापति, प्रशासक, दानवीर और कूटनीतिज्ञ भी थे। मुगल सम्राट अकबर ने उन्हें अपने दरबार के नवरत्नों में स्थान दिया। राजकीय उत्तरदायित्व निभाने के बावजूद उनका मन भक्ति, साहित्य और लोककल्याण में लगा रहता था।

श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति
यद्यपि रहीम मुस्लिम परिवार में जन्मे थे, परन्तु उनकी भक्ति किसी एक सम्प्रदाय तक सीमित नहीं थी। उन्होंने श्रीकृष्ण के सौन्दर्य, करुणा और प्रेम का अत्यन्त मधुर वर्णन किया।
Brajrasik पर उपलब्ध उनका प्रसिद्ध पद—
“तैं रहीम मन आपुनो, कीन्हौं चारु चकोर…”
में वे अपने मन को उस चकोर पक्षी के समान बनाने की प्रेरणा देते हैं, जो सदैव चन्द्रमा की ओर निहारता रहता है। इसी प्रकार भक्त का मन भी श्रीकृष्ण के दिव्य मुखारविन्द में ही स्थिर रहना चाहिए।
साहित्यिक योगदान
रहीम दास हिन्दी साहित्य के महान कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में—
- नीति
- भक्ति
- प्रेम
- दया
- विनम्रता
- जीवन-दर्शन
का सुंदर समन्वय मिलता है।
उन्होंने दोहे, कवित्त, सवैये और अन्य छन्दों में अनेक अमर रचनाएँ लिखीं, जो आज भी जन-जन की वाणी में जीवित हैं।
रहीम जी के प्रसिद्ध विचार
उनके दोहे केवल साहित्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं।
उनका प्रसिद्ध दोहा—
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।“
यह सिखाता है कि प्रेम और विश्वास का संबंध अत्यन्त कोमल होता है; एक बार टूट जाने पर वह पहले जैसा नहीं रह पाता।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
- महान कृष्ण भक्त
- अकबर के नवरत्न
- ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि
- दानवीर
- विनम्र स्वभाव
- धर्मों के प्रति समान सम्मान
- नीति और भक्ति के उपदेशक
आज जब समाज विभाजन और तनाव का सामना कर रहा है, तब रहीम दास जी का जीवन हमें प्रेम, सहिष्णुता, परस्पर सम्मान और मानवता का संदेश देता है। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रेरणादायक हैं जितनी उनके समय में थीं।
“रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।”
अर्थ :- रहीम दास जी कहते हैं कि थोड़ी देर के लिए विपत्ति (दुख) आना भी अच्छा होता है, क्योंकि इससे दुनिया में कौन हितैषी है और कौन नहीं, यह पता चल जाता है।”
“रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।”
अर्थ :- रहीम दास जी कहते हैं कि जीभ बावरी (पागल) की तरह होती है और कभी-कभी ऐसी बातें बोल देती है जिससे बाद में पछताना पड़ता है। यह बताता है कि जीभ से निकलने वाली बातें स्वर्ग से लेकर पाताल तक पहुँच सकती हैं, जबकि मन को अंदर ही रहने की ज़रूरत होती है और कपाल पर जूते खाने पड़ते हैं।