ब्रज की पारंपरिक धार्मिक भूगोल में द्वादश वन का विशेष उल्लेख मिलता है। प्रचलित सूची में मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, काम्यवन, खदिरवन, वृंदावन, भद्रवन, भांडीरवन, बेलवन, लोहवन और महावन शामिल किए जाते हैं। वर्तमान समय में इन सभी नामों को समान रूप से घने जंगल के रूप में देखना उचित नहीं है; कई स्थान अब गाँव, तीर्थ-क्षेत्र, कुंड या सांस्कृतिक स्मृति-स्थल के रूप में विकसित हो चुके हैं।
मधुवन (Dwadash Van)

मधुवन (महोली) ब्रजमंडल के द्वादश वनों (बारह वनों) में से पहला और अत्यंत प्राचीन पवित्र वन है। इसे ब्रज की तप और साधना से जुड़ी कथाओं के संदर्भ में याद किया जाता है। ध्रुव की तपस्या और मधु से संबंधित कथाओं से जुड़ा वन-नाम। सत्ययुग में भगवान विष्णु ने यहाँ मधु नामक राक्षस का वध किया था, जिसके बाद उनका नाम ‘मधुसूदन’ पड़ा। इसी स्थान पर ध्रुव महाराज ने कठोर तपस्या की थी।
तालवन (Dwadash Van)

तालवन ब्रज की पारंपरिक ताल/ताड़ वृक्षों से जुड़ा ब्रज की कथा-परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम (दाऊजी) ने गधे के रूप में रहने वाले आतंकारी राक्षस धेनुकासुर का वध किया तालवन के पास ही भगवान बलराम द्वारा अपनी छड़ी (वेत्र) से प्रकट किया गया संकर्षण कुंड स्थित है।
कुमुदवन (Dwadash Van)

कुमुदवन का नाम कुमुद पुष्प और जल-परिदृश्य की स्मृति से जोड़ा जाता है। यह ब्रज के जल, पुष्प और वन-संस्कृति की कल्पना को समझने में सहायक है। भगवान श्रीकृष्ण अपने ग्वाल-बालों और गायों के साथ इस वन में आते थे तथा कुमुद के फूलों की मालाएँ बनाकर एक-दूसरे को पहनाते थे। पद्म-कुंड (कृष्ण कुंड) कुंड में स्नान करने से विशेष आध्यात्मिक ज्ञान और पुण्य की प्राप्ति होती है। कपिल देव मंदिर कुंड के तट पर महर्षि कपिल का एक छोटा सा प्राचीन मंदिर और उनकी मूर्ति स्थित है, जिन्होंने यहाँ कठोर तपस्या की थी।
बहुलावन (Dwadash Van)

बहुलावन बहुला गाय की सत्यनिष्ठा और श्री कृष्ण की लीला कथा तथा संकर्षण कुंड के लिए प्रसिद्ध है। यह ब्रज की गौ-संस्कृति और करुणा के भाव को सामने लाता है।आध्यात्मिक दृष्टि से बहुलावन का संदेश करुणा, वचन-पालन और पशु-सेवा।
काम्यवन (Dwadash Van)

काम्यवन कामना और अनेक कुंड-तीर्थों से जुड़ी ब्रज परंपरा। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने कई बाल लीलाएँ कीं। पांडवों ने अपने वनवास के दौरान यहाँ काफी समय बिताया था। इसे कामना, साधना और अनेक तीर्थ-स्मृतियों से जोड़ा जाता है। वर्तमान में कामां क्षेत्र से इसका संबंध बताया जाता है इस वन का दर्शन करने से जीवन की सभी वैध इच्छाएं पूर्ण होती हैं और मन शांत रहता है।
खदिरवन (Dwadash Van)

खदिरवन का नाम खदिर वृक्ष से जोड़ा जाता है। यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने बछड़े चराते समय बकासुर राक्षस का वध किया था। संगम कुंड जिसे राधा कुंड और माधव कुंड का मिलन स्थल माना जाता है। यह वन-परंपरा ब्रज के पुराने वृक्षीय भू-दृश्य की स्मृति को जीवित रखती है।आध्यात्मिक दृष्टि से खदिरवन का संदेश वृक्ष और हरित क्षेत्र
वृंदावन (Dwadash Van)

वृंदावन राधा-कृष्ण भक्ति, मंदिर और कुंज-स्मृति का प्रमुख केंद्र। स्वयं वृंदा देवी द्वारा रक्षित और कृष्ण को अतिप्रिय मुख्य वन। वृंदावन आज एक प्रमुख तीर्थ-नगर है, लेकिन इसका नाम ब्रज की वन-स्मृति से निकटता से जुड़ा है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ी ये भूमि अत्यंत पावन और मोक्षदायिनी मानी जाती हैं।
भद्रवन (Dwadash Van)

इसे भगवान श्री कृष्ण और बलराम की गोचारण (गाय चराने) और क्रीड़ा स्थली माना जाता है। श्री बलराम के एक नाम ‘बलभद्र’ के आधार पर इस पवित्र वन का नाम ‘भद्रवन’ पड़ा है। शुभता और वन-स्मृति से जुड़ा क्षेत्र। कल्याण और सुख-समृद्धि देने वाला, जहाँ भद्रेश्वर महादेव हैं।
भांडीरवन (Dwadash Van)

भांडीरवन ब्रज की पारंपरिक द्वादश वन परंपरा का एक महत्वपूर्ण नाम है। भांडीर वट, श्रीदामा और विभिन्न राधा-कृष्ण परंपराओं से जुड़ा वन। भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी का गुप्त विवाह ब्रह्मा जी ने संपन्न कराया था। भांडीरवट वृक्ष यहाँ का प्राचीन वटवृक्ष (बरगद) उस दिव्य विवाह का मुख्य साक्षी माना जाता है।
बेलवन (Dwadash Van)

बेल/बिल्व वृक्ष और लक्ष्मीजी की तपस्या की कथा से जुड़ा। प्राचीन काल में यहाँ बेल (बिल्व) के पेड़ों का घना जंगल था, जहाँ भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ गाय चराते और लीलाएँ करते। बेलवन में माँ लक्ष्मी का एक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर स्थित है।
लोहवन (Dwadash Van)

लोहजंघ/लोहासुर से जुड़ी कथा-परंपरा का वन। द्वापर युग में कंस ने यहाँ लोहासुर (लोहजंघासुर) नामक दैत्य को तैनात किया था। श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में ही इस असुर का वध किया। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अपनी गायों को चराने आते थे और बाल-लीलाएं करते। आध्यात्मिक दृष्टि से लोहवन का संदेश छोटे तीर्थों और स्थानीय स्मृति का महत्व।
महावन (Dwadash Van)

गोकुल और कृष्ण के बाल्यकाल की स्मृतियों से जुड़ा प्रमुख क्षेत्र। यह भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की लीलाओं, नंद बाबा के नन्द गोकुल और उनके शुरुआती जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहीं पर श्रीकृष्ण ने पूतना और तृणावर्त जैसे असुरों का उद्धार किया था