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Govardhan Parikrama
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Govardhan Parikrama

गोवर्धन परिक्रमा – श्रीगिरिराज की शरण में भक्ति, श्रद्धा और सेवा की आध्यात्मिक यात्रा

श्रीराधे।

ब्रजभूमि में अनेक पवित्र स्थल हैं, लेकिन श्रीगोवर्धन धाम का अपना विशेष महत्व है। ब्रज की परम्परा में गिरिराज गोवर्धन को श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। गोवर्धन की परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भक्त के लिए श्रद्धा, समर्पण, नाम-स्मरण और सेवा का मार्ग है।

हर दिन देश-विदेश से श्रद्धालु गोवर्धन पहुँचते हैं। कोई पैदल परिक्रमा करता है, कोई दण्डवत् परिक्रमा, तो कोई परिवार के साथ गिरिराज महाराज के दर्शन और परिक्रमा के लिए आता है। परिक्रमा के दौरान “राधे-राधे” और “गिरिराज महाराज की जय” की ध्वनि पूरे मार्ग को भक्तिमय बना देती है।

गोवर्धन का धार्मिक महत्व

ब्रज की धार्मिक परम्परा में गोवर्धन का संबंध श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध गोवर्धन लीला से है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित कथा के अनुसार, जब ब्रजवासी इन्द्र-यज्ञ की तैयारी कर रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गोवर्धन, गौधन और ब्रज के प्राकृतिक आधार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया।

ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण की प्रेरणा से गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया। इससे इन्द्र क्रोधित हुए और ब्रज पर प्रचण्ड वर्षा करवाई। तब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उँगली पर धारण कर लिया।

सात दिनों तक ब्रजवासी और उनका गौधन गिरिराज के नीचे सुरक्षित रहे। इसी लीला ने गोवर्धन को ब्रजभक्ति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया।

गोवर्धन परिक्रमा

गोवर्धन परिक्रमा का अर्थ है श्रीगिरिराज पर्वत की परिक्रमा करते हुए उनके पवित्र क्षेत्र का दर्शन और स्मरण करना।

जिला प्रशासन, मथुरा की ब्रज परिक्रमा संबंधी जानकारी के अनुसार गोवर्धन परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की मानी जाती है।

परिक्रमा का आरंभ और समापन सामान्यतः गोवर्धन के प्रमुख तीर्थ क्षेत्र में किया जाता है। अनेक श्रद्धालु मानसी गंगा से परिक्रमा शुरू करते हैं, जबकि कुछ लोग अपने सुविधानुसार अन्य स्थानों से भी यात्रा आरंभ करते हैं।

परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु विभिन्न मंदिरों, कुंडों और पवित्र स्थलों के दर्शन करते हुए आगे बढ़ते हैं।

मानसी गंगा

गोवर्धन यात्रा में मानसी गंगा का विशेष स्थान है। ब्रज की धार्मिक परम्परा में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।

मानसी गंगा के किनारे अनेक मंदिर और घाट स्थित हैं। श्रद्धालु यहाँ दर्शन और पूजन करने के बाद अपनी परिक्रमा आरंभ करते हैं।

ब्रज में मानसी गंगा से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं। इन्हीं कथाओं के कारण यह स्थान गोवर्धन यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया है।

दानघाटी मंदिर

गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में दानघाटी सबसे प्रसिद्ध स्थानों में से एक है।

ब्रज की लोक एवं भक्ति परम्परा में दानघाटी का संबंध श्रीकृष्ण की दान-लीला से जोड़ा जाता है। यहाँ गिरिराज महाराज का प्रसिद्ध मंदिर है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करते हैं।

परिक्रमा करने वाले भक्त यहाँ रुककर पूजा करते हैं और आगे की यात्रा के लिए बढ़ते हैं।

परिक्रमा मार्ग के प्रमुख स्थल

परिक्रमा के दौरान कई महत्वपूर्ण स्थान आते हैं। इनमें मानसी गंगा, दानघाटी, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, कुसुम सरोवर, पूँछरी का लौठा और गोवर्धन के आसपास के विभिन्न कुंड एवं मंदिर प्रमुख हैं।

इन स्थानों की अपनी-अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराएँ हैं।

गोवर्धन परिक्रमा की विशेषता यही है कि यह केवल एक पर्वत के चारों ओर घूमना नहीं है। इसके मार्ग में ब्रज की अनेक धार्मिक स्मृतियाँ और तीर्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड

गोवर्धन क्षेत्र में राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।

ब्रज की वैष्णव परम्पराओं में इन दोनों कुंडों को अत्यंत श्रद्धा के साथ देखा जाता है। भक्त यहाँ स्नान, दर्शन, पूजन और नाम-स्मरण करते हैं।

राधाकुण्ड को श्रीराधा से और श्यामकुण्ड को श्रीकृष्ण से संबंधित माना जाता है। इन दोनों पवित्र स्थलों के दर्शन गोवर्धन यात्रा को और अधिक भावपूर्ण बना देते हैं।

कुसुम सरोवर

गोवर्धन क्षेत्र के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में कुसुम सरोवर भी आता है।

यह स्थान अपने सुंदर घाट, जलाशय और ऐतिहासिक स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का शांत वातावरण परिक्रमा के बीच श्रद्धालुओं को कुछ समय ठहरने और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव करने का अवसर देता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त के समय कुसुम सरोवर का दृश्य विशेष रूप से आकर्षक दिखाई देता है।

पूँछरी का लौठा

गोवर्धन परिक्रमा के अंतिम हिस्से में पूँछरी का लौठा भी एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है।

गोवर्धन पर्वत के आकार को ब्रज की परम्परा में गाय के समान माना जाता है और पूँछरी का क्षेत्र उसके पूँछ वाले हिस्से से जोड़ा जाता है। यहाँ स्थित धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रखते हैं।

इस स्थान से जुड़ी अनेक लोककथाएँ और ब्रज की स्थानीय मान्यताएँ पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं।

पैदल गोवर्धन परिक्रमा

अधिकांश श्रद्धालु गोवर्धन की परिक्रमा पैदल करते हैं।

कोई सुबह जल्दी यात्रा शुरू करता है, तो कोई शाम के समय। गर्मी के मौसम में प्रातः या देर शाम का समय अपेक्षाकृत सुविधाजनक रहता है।

परिक्रमा के दौरान भक्त अपने साथ जल रखते हैं, बीच-बीच में विश्राम करते हैं और मंदिरों में दर्शन करते हुए आगे बढ़ते हैं।

कई श्रद्धालु पूरी यात्रा के दौरान माला-जप, भजन या नाम-स्मरण करते रहते हैं।

इससे परिक्रमा केवल शारीरिक यात्रा न रहकर एक साधना का रूप ले लेती है।

दण्डवत् परिक्रमा

गोवर्धन परिक्रमा का एक अत्यंत कठिन और श्रद्धापूर्ण रूप दण्डवत् परिक्रमा है।

इसमें भक्त भूमि पर दण्डवत् प्रणाम करता है, फिर उठकर कुछ दूरी आगे बढ़ता है और पुनः प्रणाम करता है। इसी प्रकार पूरी परिक्रमा पूरी करने का प्रयास किया जाता है।

यह साधना शारीरिक रूप से काफी कठिन होती है और इसे करने वाले श्रद्धालु लंबे समय और अत्यधिक धैर्य के साथ यात्रा पूरी करते हैं।

दण्डवत् परिक्रमा का मूल भाव समर्पण और विनम्रता है।

गोवर्धन परिक्रमा में सेवा का महत्व

ब्रज की भक्ति परम्परा में सेवा का विशेष स्थान है। परिक्रमा मार्ग में श्रद्धालुओं के लिए जल, भोजन, छाछ और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाले अनेक सेवा-स्थल दिखाई देते हैं।

गौ सेवा भी गोवर्धन क्षेत्र की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गोवर्धन लीला स्वयं गौधन और ब्रज के जीवन से गहराई से जुड़ी है। इसलिए गिरिराज की यात्रा के साथ गौ सेवा, अन्न सेवा और जरूरतमंद यात्रियों की सहायता को भी भक्तिभाव से देखा जाता है।

गोवर्धन परिक्रमा का आध्यात्मिक भाव

गोवर्धन परिक्रमा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी दूरी नहीं, बल्कि भाव है।

जब भक्त गिरिराज की परिक्रमा करता है, तो वह अपने मन में श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का स्मरण करता है।

वह उस प्रसंग को याद करता है जब ब्रज पर संकट आया था और श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों को आश्रय दिया था।

इसलिए गिरिराज की परिक्रमा भक्त के भीतर यह विश्वास जगाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ आएँ, भगवान की शरण और विश्वास मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाते हैं।

गोवर्धन परिक्रमा और ब्रज संस्कृति

गोवर्धन परिक्रमा ब्रज की जीवित संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

परिक्रमा मार्ग में आपको साधु-संत, स्थानीय ब्रजवासी, परिवार, वृद्ध, बच्चे और देश-विदेश से आए श्रद्धालु एक साथ दिखाई दे सकते हैं। कोई भजन गाते हुए चलता है। कोई माला जपता है। कोई “राधे-राधे” कहते हुए आगे बढ़ता है। और कोई शांत भाव से गिरिराज का स्मरण करता हुआ यात्रा पूरी करता है। यह विविधता ही गोवर्धन यात्रा को विशेष बनाती है।

गोवर्धन परिक्रमा कब करें?

गोवर्धन की यात्रा वर्षभर की जा सकती है, लेकिन पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी, गोवर्धन पूजा और प्रमुख ब्रज पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से बढ़ जाती है।

विशेष रूप से गोवर्धन पूजा और अन्नकूट के अवसर पर यहाँ बहुत बड़ा धार्मिक उत्सव देखने को मिलता है।

यदि कोई व्यक्ति शांत वातावरण में परिक्रमा करना चाहता है, तो सामान्य दिनों में जाना अधिक सुविधाजनक हो सकता है।

लगभग 21 किलोमीटर की यह यात्रा भक्त को केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं ले जाती। यह उसे गोवर्धन लीला, ब्रज संस्कृति, सेवा, नाम-स्मरण और श्रीकृष्ण की शरण के भाव से जोड़ती है।

गिरिराज की धूल में चलते हुए जब भक्त बार-बार “राधे-राधे” या “गिरिराज महाराज की जय” कहता है, तो यात्रा धीरे-धीरे बाहरी मार्ग से भीतर की यात्रा बन जाती है।

यही गोवर्धन परिक्रमा की सबसे सुंदर अनुभूति है।

श्रीगोवर्धन परिक्रमा ब्रज की श्रद्धा, संस्कृति और भक्ति का जीवंत स्वरूप है। यहाँ हर कदम के साथ श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का स्मरण होता है और गिरिराज महाराज के प्रति श्रद्धा प्रकट होती है।

मानसी गंगा से लेकर दानघाटी, राधाकुण्ड-श्यामकुण्ड, कुसुम सरोवर और पूँछरी तक यह यात्रा ब्रज के अनेक पवित्र स्थलों को एक सूत्र में जोड़ती है।

जो भक्त इस मार्ग पर चलता है, वह केवल गोवर्धन की परिक्रमा नहीं करता—वह अपने आराध्य के प्रति प्रेम, विश्वास, विनम्रता और समर्पण की भावना को भी अपने भीतर मजबूत करता है।

जय श्रीगिरिराज महाराज।
श्रीराधे।

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