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श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाई जी)
Saints of Braj

श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाई जी)

गीता प्रेस के प्रेरणास्रोत, ‘कल्याण‘ पत्रिका के अमर संपादक एवं श्री राधा–कृष्ण के अनन्य भक्त

भारतीय सनातन संस्कृति के इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने स्वयं को प्रसिद्धि से दूर रखकर समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे ही दिव्य महापुरुषों में पूज्य श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी, जिन्हें प्रेमपूर्वक “भाई जी“ कहा जाता है, का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा से लिया जाता है।

उन्होंने भारतीय संस्कृति, धर्मग्रंथों और भक्ति साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में जो योगदान दिया, वह अद्वितीय है। गोरखपुर स्थित गीता प्रेस और उसकी प्रसिद्ध आध्यात्मिक मासिक पत्रिका “कल्याण“ के माध्यम से उन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन में आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। साथ ही वे श्री राधा-कृष्ण के अत्यंत रसिक उपासक थे और उनकी रचनाएँ “पद रत्नाकर“ के नाम से प्रसिद्ध हैं।

श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी का जन्म 17 सितम्बर 1892 को राजस्थान के रतनगढ़ (चूरू) में एक धार्मिक मारवाड़ी परिवार में हुआ। बचपन से ही उनके भीतर धर्म, सेवा और आध्यात्मिक जीवन के संस्कार थे। बाद में उनका अधिकांश कार्यक्षेत्र गोरखपुर बना।

गीता प्रेस से जुड़ाव

सन 1923 में स्थापित गीता प्रेस, गोरखपुर से भाई जी का गहरा संबंध रहा। उन्होंने सेठ जयदयाल गोयनका तथा अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर गीता, रामायण, श्रीमद्भागवत, पुराण और अन्य वैदिक ग्रंथों को अत्यंत कम मूल्य पर जनसामान्य तक पहुँचाने का महान कार्य किया।

‘कल्याण‘ पत्रिका के यशस्वी संपादक

भाई जी कई दशकों तक “कल्याण“ पत्रिका के संपादक रहे।

उन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से—

  • श्रीमद्भगवद्गीता
  • श्रीरामचरितमानस
  • श्रीमद्भागवत
  • उपनिषद
  • संत साहित्य
  • भक्ति, ज्ञान और वैराग्य

पर आधारित विशेषांक प्रकाशित कर भारतीय समाज को अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर प्रदान की। आज भी “कल्याण” भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित धार्मिक पत्रिकाओं में गिनी जाती है।

श्री राधा–कृष्ण के अनन्य भक्त

यद्यपि अधिकांश लोग भाई जी को गीता प्रेस से जोड़कर जानते हैं, परन्तु उनके हृदय का वास्तविक केंद्र श्री राधा–कृष्ण की माधुर्य भक्ति थी।

उनकी वाणी में श्री वृन्दावन, श्री यमुना, श्री राधारानी और श्री श्यामसुन्दर की मधुर निकुंज लीलाओं का अत्यंत रसपूर्ण वर्णन मिलता है। Brajrasik पर उनके अनेक पद उपलब्ध हैं, जिनमें राधा-कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य प्रेमभावना स्पष्ट दिखाई देती है।

‘पद रत्नाकर‘ – भक्ति साहित्य की अमूल्य निधि

भाई जी द्वारा रचित पदों और दोहों का संग्रह “पद रत्नाकर“ के नाम से प्रसिद्ध है।

इसमें—

  • श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी लीलाएँ,
  • विनय और प्रार्थना,
  • श्री राधा नाम की महिमा,
  • वृन्दावन धाम का वर्णन,
  • साधक की आत्मसमर्पण भावना

का अत्यंत मधुर चित्रण मिलता है।

साहित्य सेवा

भाई जी केवल संपादक ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के लेखक भी थे।

उन्होंने अनेक आध्यात्मिक पुस्तकों, लेखों और प्रवचनों के माध्यम से सनातन धर्म का सरल और व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में भक्ति, सदाचार और ईश्वर-प्रेम जागृत करना था।

महाप्रयाण

श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने 22 मार्च 1971 को गोरखपुर में अपनी देहलीला का समापन किया। आज भी उनके द्वारा स्थापित आध्यात्मिक परम्परा और साहित्य लाखों लोगों को धर्म, भक्ति और सदाचार की प्रेरणा देता है।

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